सचेतन 143 : श्री शिव पुराण- ईश्वर का दर्शन संभव है।

जीवन के आनंदमय यात्रा में सृष्टि का आभास 

श्री शिव पुराण की कथा हमारे जीवन के विकास की अनंत संभावनाओं को बताता है।लेकिन इन संभावनाओं के होते हुए भी, हम जीवन में वो हासिल नहीं कर पाते जिसके हम योग्य होते हैं, इसका कारण सिर्फ यही है की हम ख़ुद को नहीं पहचान पाते हैं।   

हम ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ महावाक्य के बारे में बहुत बार बात करते हैं। इस महावाक्य का अर्थ है- 'मैं ब्रह्म हूं। यहाँ 'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब हम उसी के रूप में ढल जाते हैं। 

जैसे आप जिस वातावरण में रहेंगे आप वैसे ही बन जाएंगे।अगर बात करें आपके रूप की तो आपका मनुष्य जीवन वास्तविक रूप में तो देवताओं के श्रेष्ठ रूप की प्रतिमूर्ति   है, जरूरत है तो बस इसे पहचानने की।

जीवन का यदि कोई नाद है तो वह है शिवोहम शिवोहम। यह जानना की मै केवल शरीर भर नहीं, ब्रह्म हूँ और ईश्वर को प्राप्त करने का सामर्थ्य मुझमे है, कठिन जरूर है, असंभव नहीं।आप अपने अंदर की आवाज़ को सुने। जिस दिशा से आवाज़ आ रही हो उस दिशा की ओर चलने की आवश्यकता है। 

बाकी जब हम ईश्वर की ओर एक कदम बढ़एंगे तो वह हमारी और कई कदमों को  बढ़ाएंगे। जीवन एक यात्रा है, आनंद भरी यात्रा। ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा हमें आनंद की अनुभूति दे सकती है।

जीवन के आनंदमय यात्रा में परब्रह्म के विषय में ज्ञान और अज्ञान से किए गए संबोधन के द्वारा कुछ समय बाद आपके अंदर सृष्टि का आभास होगा जिससे एक से अनेक होने के संकल्प भी उदय होगा।आप सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि ब्रह्मांड के लिए रचनात्मक सोच लायेंगे। ईश्वर का दर्शन भी जीवन की इस यात्रा में ही संभव है।   

वैसे तो हम ईश्वर को उनकी अपनी लीला के अनुसार सोचते हैं और उनकी मूर्ति, आकर, रूप आदि की रचना हमारे सोच में आने लगता है।अगर इस ईश्वर को अपने सोच में रखते हैं तो वह ईश्वर, देवी देवता, आपको संपूर्ण ऐश्वर्य तथा गुणों से युक्त, संपन्न, सर्वज्ञानमयी एवं सबकुछ प्रदान करने वाली महसूस होने लगती है। यही विश्वास सदाशिव की मूर्ति है। 

सभी पण्डित, विद्वान इसी प्राचीन मूर्ति को ईश्वर कहते हैं।उसने अपने शरीर से स्वच्छ शरीर वाली एवं स्वरूपभूता शक्ति की रचना की। यही जीवन के आनंदमय यात्रा में आपके अंदर सृष्टि का आभास है, जिससे आप सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि ब्रह्मांड के लिए रचनात्मक सोच प्रारंभ करते हैं। 

यही  रचनात्मक सोच परमशक्ति, प्रकृति गुणमयी और बुद्धित्व की जननी कहलाई। उसे शक्ति, अंबिका, प्रकृति, संपूर्ण लोकों की जननी, त्रिदेवों की माता, नित्या और मूल कारण भी कहते हैं। 

इस रचनात्मक सोच की परमशक्ति विचित्र है तब आपके पास दो नहीं बहुत सारे हाथ हो जाते हैं जिससे आप पूरे विश्व का कल्याण कर सकते हैं। आपने देवी देवताओं के रूप को देखा होगा उनको आठ, दस पता नहीं कितनीं भुजाएं हैं एवं मुख की शोभा विचित्र है। उसके मुख के सामने चंद्रमा की कांति भी क्षीण हो जाती है। विभिन्न प्रकार के आभूषण एवं गतियां देवी देवताओं की शोभा बढ़ाती हैं। वे अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं। यह रचनात्मक परमशक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ आपके अंदर ईश्वर को उनकी अपनी लीला के अनुसार सोचने के कारण जागरूक हुआ है और उनकी मूर्ति, आकर, रूप आदि की रचना हमारे सोच से बनी है।

सदाशिव को ही सब मनुष्य परम पुरुष, ईश्वर, शिव-शंभु और महेश्वर कहकर पुकारते हैं। उनके मस्तक पर गंगा, भाल में चंद्रमा और मुख में तीन नेत्र शोभा पाते हैं। उनके पांच मुख हैं तथा दस भुजाओं के स्वामी एवं त्रिशूलधारी हैं। वे अपने शरीर में भस्म लगाए हैं। 

ईश्वर रूप को साक्षात्कार कर हम निर्माण का काम कर सकते हैं, सभी का कल्याण कर सकते हैं और मोक्ष भी संभव है।  

जैसे शिव पुराण के अनुसारसदाशिव शिवलोक नामक क्षेत्र का निर्माण किया है। यह परम पावन स्थान काशी नाम से जाना जाता है। यह परम मोक्षदायक स्थान है। कहते हैं इस क्षेत्र में परमानंद रूप 'शिव' पार्वती सहित निवास करते हैं। शिव और शिवा ने प्रलयकाल में भी उस स्थान को नहीं छोड़ा। इसलिए शिवजी ने इसका नाम आनंदवन रखा है।

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