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सचेतन 128 : श्री शिव पुराण- भक्ति से अर्पित हर वस्तु को स्वीकार करना चाहिए

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शिव आपकी परीक्षा लेते हैं  श्रीकालहस्तेश्वर मंदिर में शिकारी थिम्मन बैठकर शिव से अपने दिल की बात करते थे और शिवलिंग पर मांस अर्पण किया करते थे। भगवान शिव ने उनके प्रसाद को स्वीकार करते थे क्योंकि थिम्मन दिल के शुद्ध थे और उनकी भक्ति सच्ची थी। एक  बार लगा कि लिंग की सफाई जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बरतन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने मुंह में पानी भर कर लाए और वही पानी लिंग पर डाल दिया। मंदिर का पुजारी ब्राह्मण मंदिर आया तो मंदिर में मांस और लिंग पर थूक देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, लिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया। लेकिन हर बार आने पर उसे लिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता। एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा, “हे देवों के देव, आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।” शिव ने जवाब दिया, “जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है। मैं उसकी भक्ति से बंधा हुआ हूं और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूं। अगर तुम उसकी भ...

सचेतन 127 : श्री शिव पुराण- उग्रा महादेव, श्री कालहस्ती मंदिर की कथा

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शिव सिर्फ़ भक्त की भक्ति से बंधे हुए हैं  श्री शिव पुराण भगवान शिव की अष्टमूर्तियों (रूपों) की बात करते हैं । सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव, ईशान शिव की आठ मूर्तियाँ हैं। पुराण इन आठ रूपों के लिए अधिष्ठानों की व्याख्या करते हैं, जो पृथ्वी के लिए सर्व, जल के लिए भव, अग्नि के लिए रुद्र, वायु के लिए उग्र, अंतरिक्ष के लिए भीम, यजमान के लिए पशुपति, चंद्रमा के लिए महादेव और सूर्य के लिए ईशान हैं।  हम सभी ने अभी तक सर्व, भव, रुद्र और भीम के बारे में कुछ विचार सुने हैं। अब  हम उग्र रूप के बारे में बात करेंगे। उग्रा वायु लिंग है। उग्रा महादेव का मंदिर श्री कालहस्ती, आंध्र प्रदेश में है। श्री कालहस्तीश्वर मंदिर श्री कालहस्ती में स्वर्ण मुखी नदी के तट पर स्थित है। आध्यात्मिक रूप से उन्नत आत्माएं ही देख सकती हैं कि लिंग के चारों ओर तेज हवा चल रही है।  भक्त कन्नप्पा की कहानी इस मंदिर से जुड़ी हुई है। इस भगवान की पूजा करने से जानवरों को भी मुक्ति मिल जाती है। तीन जानवरों - मकड़ी का जाला/कोबवे (श्री), कला (सांप), और हस्ती (हाथी) ने अत्यंत विश्वास और भक्ति के साथ भगवान स...

सचेतन 126 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- तामसिक बनकर भजन नहीं हो सकता है।

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अध्यात्म के अस्वीकृती के कारण हमारे जीवन में नकारात्मकता भर जाता है। जिस व्यक्ति में तामसी प्रकृति के गुण की प्रधानता हो जिसके अनुसार जीव क्रोध आदि नीच वृत्तियों के वशीभूत होकर आचरण करता है। व्यक्ति को निद्रा, आलस्य, आदि से उत्पन्न सुख का अहसास होता और इसे तामस सुख कहते हैं। जब आप जीवन में असत्यप्रवीर्ति यानी सत्य को झुठलाने की प्रवीर्ति करने लगते हैं, अंधविश्वास की ओर जाने लगते हैं, पशुहिंसा, लोभ, मोह, अहंकार आदि आने लगता है तो आपके जीवन में तामस कर्म बढ़ रहा है।  श्री रामचरीतमानस के अरण्यकाण्ड के दोहे में तुलसी दास जी बहुत अच्छे से कहा है -  होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥ इसका अर्थ है की इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं, क्योंकि तामस आपके मन, वचन और कर्म से दृढ़ निश्चय होकर अंदर बैठा होता है। काकभुशुण्डि ने अपनी पूर्व जन्म कथा और कलि महिमा में कहा है की - सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड॥ हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात्‌ काम, क्रोध और लोभ...

सचेतन 125 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- भीम रूप में शिव का वर्णन

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भीम रूप भगवान शिव की आकाशरूपी मूर्ती का नाम है जिसकी अराधना से तामसी गुणों का नाश होता है जीवन में हो रहे ऊर्जा के रूपांतरण को रुद्र समझें! रुद्र के आठ रूपों का उल्लेख सर्व, भव, भीम, उग्र, ईशान, पशुपति, महादेव, असनी के रूप में किया गया है। सर्व नाम जल को दर्शाता है, उग्र हवा है, असनी बिजली है, भव पर्जन्य (मेघ) है, पशुपति पौधा है, ईशान सूर्य है, महादेव चंद्रमा और प्रजापति हैं। ये सभी रूपांतरित होते रहते हैं।  आज हम भीम के बारे में कुछ चर्चा करते हैं। भीम रूप भगवान शिव की आकाशरूपी मूर्ती का नाम है जिसकी अराधना से तामसी गुणों का नाश होता है. भीम रूप में शिव के देह पर भस्म, जटाजूट, नागों की माला होती है और उन्हें बाघ की खाल पर विराजमान दिखाया जाता है. भीमा: - आकाश लिंग, चिदंबरम , तमिलनाडु। यह क्षेत्र कावेरी के तट पर है। मंदिर के गर्भगृह में हमें कोई मूर्ति नहीं दिखती। पुराण में इस क्षेत्र की बहुत उच्च चर्चा किया जाता है। उच्चतम आध्यात्मिक आत्माओं को छोड़कर कोई भी भगवान की मूर्ति को नहीं देख सकता है। गर्भगृह में एक जगह है और कई अभ्यारण्य सजाए गए हैं और भक्त मानते हैं कि भगवान वहां विराज...

सचेतन 124 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- प्रार्थना, ध्यान और विचार का श्रवण एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है

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शांत, शुद्ध और निर्मल चित्त से  शिव की प्राप्ति संभव है!  सचेतन का श्री शिव पुराण पर विशेष विचारों के चिंतन का यह 124 वाँ सत्र है और सबसे पहला विचार यह था की  श्री शिव पुराण के ज्ञान मात्र से ही आपके आंतरिक विकास की प्रबल संभावनाएं बढ़ जाती हैं! सचेतन में विचार की अभिव्यक्ति से हमें ऐसा महसूस हो रहा है की आप सभी के अंदर आंतरिक विकास की प्रबल संभावनाएं हैं, शिवपुराण की उत्कृष्ट महिमा आपके जीवन को मंगलकारी तथा पवित्र बना सकता है।  कहते हैं की शुद्ध निर्मल चित्त से  शिव की प्राप्ति संभव है! श्रीशिवपुराण का माहात्म्य आपके इन्द्रिय, अर्थ, मन, बुद्धि, आत्मा, अव्यक्त माया, और पुरुष इन सभी की तीव्रता को रूपांतरित कर सकती है। जब भी आप किसी क्रिया मन लीन रहते हैं तो उस क्रिया के परिणाम को अंतर्भाव से महसूस करना महत्वपूर्ण है जिससे आपका संपूर्ण शरीर और मन और आत्मा आनन्दमय होती है। हमको एक बात और भी ध्यान में रखना चाहिए की प्रचंड कलियुग आने पर मनुष्य पुण्य कर्मों से दूर रहेंगे। इस विचार पर भी हम लोगों ने कई कथा का श्रवण भी किया है और इसकी एक कथा में हम सब ने सुना था की गंगा...

सचेतन 123 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- आध्यात्मिक प्रक्रिया अस्तित्व की खोज का एक आंतरिक मार्ग है

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अपने विचारों से दूर न भागें ।  मन को संतुलित करने के लिए हमको एक दृष्टिकोण बनाने की ज़रूरत होती है और हम स्वयं को ठीक करने का प्रयास करना शुरू करते हैं। अपने दृष्टिकोण बदलने की क्यों ज़रूरत है?  जब आप देखते हैं की आप अपने जीवन में पवित्र अनुष्ठान करना प्रारंभ कर देते हैं जिससे आपकी चेतना का शुद्धिकरण होता है तो समझ जायें की आपका दृष्टिकोण बदल रहा है और आप धर्म के मार्ग पर चल पड़े हैं। धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, सार्वभौम चेतना का सत्संकल्प है। धर्म के धारण का अभ्यास और पालन करने से हमारे पास आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, इच्छा शक्ति और ऊर्जा के विभिन्न स्तरों का आभास होने लगता है और आप अपने आपको सकारात्मकता के साथ प्रस्तुत करने लगते हैं। यही धर्म का अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है।  हमारे साथ ऐसा अक्सर होता है कि हम काम कुछ कर रहे होते हैं और ध्यान कहीं और होता है। यह इसलिए होता है कि मन में किसी न किसी तरह के विचार हमेशा चलते रहते हैं। मन कभी शांत नहीं रहता है। शिव की जटाओं को दे...

सचेतन 121 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- मन की स्थिति का अभ्यास करना

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भव पर्जन्य (मेघ) का सूचक है अगर रुद्र समझना हो तो जीवन में हो रहे ऊर्जा के रूपांतरण को समझें! विज्ञान में, ऊर्जा वस्तुओं का एक गुण है, जो अन्य वस्तुओं को स्थानांतरित किया जा सकता है।  रुद्र के आठ रूपों का उल्लेख सर्व, भव, भीम, उग्र, ईशान, पशुपति, महादेव, असनी के रूप में किया गया है। सर्व नाम जल को दर्शाता है, उग्र हवा है, असनी बिजली है, भव पर्जन्य (मेघ) है, पशुपति पौधा है, ईशान सूर्य है, महादेव चंद्रमा और प्रजापति हैं। इस संदर्भ से यह समझा जा सकता है कि रुद्र के इन आठ रूपों से ही सारा संसार बना है। और आपके शरीर का विज्ञान भी यही है  सर्व यानी समस्त, आदि से अंत तक, शुरू से आख़िर तक यह पहचान सृष्टीय या  वैश्विक या ब्रह्मांडीय यानी सर्वलोक जैसा समझने का है। The supreme or all-pervading spirit। भगवान से हमारा (जीवात्मा का) सम्बन्ध अनादि (जिसका प्रारंभ न हो), अनन्त, और सनातन या नित्य (सदा) है। आज हम भव जो पर्जन्य (मेघ) का सूचक है के बारे में बात करेंगे।  हमारे जीवन में बदलाव होने की अवस्था, क्रिया या भाव जिससे हमें अपनी सत्ता और सांसारिक अस्तित्व, को जन्म या उत्पत्ति करते ...

सचेतन 122 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- जीवन में पवित्र अनुष्ठान करना ही धर्म है

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मन के विचारों से मुक्ति पाने और उन्हें शांत करने का तरीका भव जो पर्जन्य (मेघ) का सूचक है यह हमारे जीवन में बदलाव होने की अवस्था, क्रिया या भाव जिससे हमें अपनी सत्ता और सांसारिक अस्तित्व, को जन्म या उत्पत्ति करते हैं और यह आदतन या भावनात्मक प्रवृत्तियाँ मात्र है। यह एक मानसिक घटना के रूप में स्वयं की भावना के उत्पन्न होने की ओर ले जाता है। आज आदि शंकराचार्य जी की जयंती है। उन्होंने कहा है कि स्वयं से मुक्त पाने के लिए ज्ञान आवश्यक है और स्वयं (आत्मन) और ब्रह्म की पहचान का केंद्रीय पद है। 8वीं शताब्दी में मंडन मिश्रा एक हिंदू दार्शनिक थे, जिन्होंने मीमांसा और विचार की अद्वैत प्रणाली को लिखा था। वह आदि शंकराचार्य के समकालीन थे, और कहा जाता है कि वे आदि शंकर के शिष्य बन गए थे, वे 10वीं शताब्दी ईस्वी तक दोनों में से सबसे प्रमुख अद्वैत थे। आत्म शुक्तम (स्वयं का गीत) में कहा गया है कि मैं चैतन्य हूं, मैं आनंद हूं, मैं शिव हूं, मैं शिव हूं. यह मेरा सौभाग्य है कि मैं मंडन मिश्र के वंश में जन्मा हूँ और सदियों पूर्व आदि गुरु शंकराचार्य जी का आशीर्वाद प्राप्त कर चुका हूँ। जब मन कमजोर होता है, स्थि...

सचेतन 120 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- पूर्ण संबंध और सर्व होने पर प्रेम होता है.

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त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।। संसार में लोगों के साथ का सम्बन्ध अनिश्‍चित हैं! एक छण (पल) का भरोसा नहीं। अगर वह आपके अनुकूल रहे, आपके स्वार्थ की सिद्धि करे, तभी सम्बन्ध बना रहेगा।  यानि संसार में जब तक सम्बन्ध था, वह स्वार्थ के आधार पर ही था। तो 'सम' का अर्थ परिपूर्ण और पूर्ण। अतएव संसार का संबंध तो परिपूर्ण हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह स्वार्थ का संबंध है, और पूर्ण नहीं है क्योंकि छणिक (कुछ समय के लिए) है। सर्व यानी समस्त, आदि से अंत तक, शुरू से आख़िर तक यह पहचान सृष्टीय या  वैश्विक या ब्रह्मांडीय यानी सर्वलोक जैसा समझना और 'सम्बन्ध' शब्द सिर्फ़ भगवान पर प्रयोग हो सकता है। भगवान से हमारा (जीवात्मा का) सम्बन्ध अनादि (जिसका प्रारंभ न हो), अनन्त, और सनातन या नित्य (सदा) है। "भगवान हमारे माता-पिता, भाई सब कुछ है"। चाहे हम किसी भी तरह के हैं "तुम स्त्री, तुम कुमार और कुमारी और तुम बूढ़े हो कर लाठी लेके चलते हो फिर भी आप भगवान से यानी अपनी जीवात्मा के साथ सम्बन्ध बनाये रखें।  ...

सचेतन 119 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- रुद्र - शरीर को विकसित करने का विज्ञान है

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संसार के लोगों का सम्बन्ध अनिश्‍चित है! अगर रुद्र समझना हो तो जीवन में हो रहे ऊर्जा के रूपांतरण को समझें! विज्ञान में, ऊर्जा वस्तुओं का एक गुण है, जो अन्य वस्तुओं को स्थानांतरित किया जा सकता है।  रुद्र के आठ रूपों का उल्लेख सर्व, भव, भीम, उग्र, ईशान, पशुपति, महादेव, असनी के रूप में किया गया है। सर्व नाम जल को दर्शाता है, उग्र हवा है, असनी बिजली है, भव पर्जन्य (मेघ) है, पशुपति पौधा है, ईशान सूर्य है, महादेव चंद्रमा और प्रजापति हैं। इस संदर्भ से यह समझा जा सकता है कि रुद्र के इन आठ रूपों से ही सारा संसार बना है। और आपके शरीर का विज्ञान भी यही है  सर्व यानी समस्त, आदि से अंत तक, शुरू से आख़िर तक यह पहचान सृष्टीय या  वैश्विक या ब्रह्मांडीय यानी सर्वलोक जैसा समझने का है। The supreme or all-pervading spirit।  सर्व नाम जल को दर्शाता है यानी यह सारे प्राणियों के जीवन का आधार है। आमतौर पर जल शब्द का प्रयोग द्रव अवस्था के लिए उपयोग में लाया जाता है पर यह ठोस अवस्था (बर्फ) और गैसीय अवस्था (भाप या जल वाष्प) में भी पाया जाता है। पानी जल-आत्मीय सतहों पर तरल-क्रिस्टल के रूप में भी प...