सचेतन- 35 –आत्मबोध – “मैं आकाश के समान हूँ”


क्या आपने कभी ध्यान दिया है—

आपके जीवन में
लोग आते हैं, जाते हैं…
परिस्थितियाँ बदलती हैं…
सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं…

लेकिन फिर भी
आपके भीतर कहीं
कुछ ऐसा है
जो इन सबके बीच
बिलकुल शांत बना रहता है?

आत्मबोध के आज के विचार में हम बात करेंगे की
यही मौन सत्य की ओर इशारा करता है—

“मैं आकाश के समान हूँ।”

शंकराचार्य कहते हैं—

मैं आकाश की तरह हूँ।
सबके भीतर भी हूँ
और बाहर भी।
मैं कभी गिरता नहीं,
सदा एक-सा रहता हूँ।
मैं शुद्ध हूँ,
असंग हूँ,
और अचल हूँ।

अब इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं।

“मैं आकाश के समान हूँ”

आकाश को देखिए—

आकाश सबके भीतर भी है
और बाहर भी।

कमरे में रखी हुई
एक छोटी-सी कटोरी में भी आकाश है,
और खुले आकाश में भी वही आकाश है।

कटोरी टूट जाए
तो क्या आकाश टूटता है?

नहीं।

ठीक वैसे ही—

शरीर बदले,
मन बदले,
रिश्ते बदले,
पर आप नहीं बदलते।

आप उन सबके
भीतर और बाहर व्याप्त चेतना हैं।

अच्युतः – मैं गिरता नहीं

हम अक्सर सोचते हैं—

“मैं पहले शांत था,
अब बिगड़ गया हूँ।”

आत्मबोध कहता है—

आप कभी गिरे ही नहीं।

आपकी पूर्णता
कभी अपूर्ण नहीं हुई।

जैसे—

  • आग कभी अपनी गर्मी नहीं खोती

  • सूरज कभी अपना प्रकाश नहीं खोता

  • पानी कभी अपनी शीतलता नहीं खोता

वैसे ही—

आप अपनी मुक्ति कभी नहीं खो सकते।

मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं,
मुक्ति आपका स्वरूप है।

सर्वसमः – सबमें एक-सा

श्लोक कहता है—

मैं सबमें समान हूँ।

शरीर अलग हैं,
नाम अलग हैं,
रूप अलग हैं—

लेकिन चेतना एक ही है।

एक ही चेतना—

  • बच्चे में भी

  • बूढ़े में भी

  • ज्ञानी में भी

  • अज्ञानी में भी

फर्क केवल
नाम और रूप का है।

सत्य का नहीं।

निःसंगः – रिश्तों से मुक्त

हमारे जीवन की
सबसे बड़ी उलझन
रिश्तों से आती है।

पति-पत्नी,
माता-पिता,
बच्चे,
समाज—

हर रिश्ता
अपेक्षाओं से भरा है।

आत्मबोध बहुत व्यावहारिक है—

यह रिश्तों को छोड़ने नहीं कहता,
यह रिश्तों से चिपकने से मुक्त होने को कहता है।

रिश्ते निभाइए,
लेकिन यह जानकर—

मैं इन सबसे बड़ा हूँ।
मैं इनसे बंधा नहीं हूँ।

जीवन में
सबको खुश करना संभव नहीं।

इस सत्य को स्वीकार कर लेना
ही भीतर की शांति है।

निर्मल और अचल

श्लोक का अंतिम संदेश—

मैं निर्मल हूँ।
मैं अचल हूँ।

मन में विचारों की हलचल हो,
जीवन में तूफ़ान आए—

पर जो देख रहा है,
वह हिलता नहीं।

आप वही हैं।

आप तूफ़ान नहीं,
आप वह आकाश हैं
जिसमें तूफ़ान आता-जाता है।

आत्मबोध के आज के विचार में
हमें यह याद दिला रहा है की —

आप—

  • शरीर नहीं हैं

  • रिश्तों में उलझा मन नहीं हैं

  • परिस्थितियों से डगमगाता “मैं” नहीं हैं

आप—

आकाश की तरह व्यापक,
सदा समान,
सदा शुद्ध,
और सदा मुक्त हैं।

बस इस सत्य को
बार-बार याद करना—

यही है
निदिध्यासन।

यही है
सचेतन जीवन। 🙏


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सचेतन :68 ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान से संभव है

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-33 : बंदर और गौरैया की कथा-2

सचेतन :74 श्री शिव पुराण- शिव की भक्ति से दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश होता है।-2