सचेतन- 10: आत्मबोध की यात्रा - “उपाधियाँ बदलती हैं— मैं नहीं”
“कभी आपने सोचा है—
हम इतने अलग क्यों दिखते हैं?
मेरा शरीर अलग, आपका अलग…
मेरी उम्र अलग, आपकी अलग…
मेरी कहानी अलग, आपकी अलग…
लेकिन क्या मैं सच में अलग हूँ?
या अलग-अलग सिर्फ़ ‘कवर’ हैं?”
यथाकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः।
तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे केवलो भवेत्॥१०॥
सरल अर्थ
“जैसे आकाश एक होते हुए भी
अलग-अलग घड़ों/कमरों (उपाधियों) के कारण
अनेक-सा प्रतीत होता है,
और उपाधि हटने पर
आकाश फिर ‘एक’ ही दिखता है—
वैसे ही परम सत्य (हृषीकेश— सर्वव्यापी आत्मा)
उपाधियों के कारण
अनेक-सा प्रतीत होता है।
उपाधि-नाश होने पर
वह ‘केवल’, अर्थात एक ही, प्रकट होता है।”
उपाधि क्या है?
“दोस्तों, ‘उपाधि’ का अर्थ है—
वह पास की चीज़
जो अपने गुण मेरे ऊपर चढ़ा देती है।
जैसे—
शरीर की उम्र, बीमारी, सुंदरता
मन के विचार, डर, क्रोध, सुख-दुख
भूमिका: पिता, शिक्षक, डॉक्टर, कर्मचारी
पहचान: मेरा नाम, मेरा पद, मेरा इतिहास
ये सब उपाधियाँ हैं। और आत्मा— जो सचमुच मैं हूँ— उनसे अलग है।
समस्या यह है— हम उपाधि को ही ‘मैं’ मान लेते हैं।”
सबसे स्पष्ट उदाहरण: आकाश और घट
“शंकराचार्य यहाँ आकाश का उदाहरण देते हैं।
मान लीजिए—
एक बड़ा आकाश है।
फिर आप एक घड़ा ले आते हैं।
घड़े के भीतर जो आकाश है,
लोग उसे कहते हैं— ‘घटाकाश’
और बाहर वाले को कहते हैं— ‘महाकाश’
अब प्रश्न:
क्या आकाश सच में दो हो गया?
नहीं।
घड़ा सिर्फ़ सीमा बनाता है।
आकाश नहीं बदलता।
घड़ा टूट गया—
‘घटाकाश’ कहाँ गया?
वह कभी अलग था ही नहीं।
बस अलग दिखता था।
ठीक यही बात हमारे बारे में है—
शरीर-मन-उपाधि के कारण
आत्मा अनेक-सी दिखती है।
पर आत्मा एक ही है— सर्वव्यापी।”
‘मैं अलग हूँ’ का भ्रम कैसे बनता है?
“जब मैं कहता हूँ—
मैं युवा हूँ / बूढ़ा हूँ
मैं दुखी हूँ / खुश हूँ
मैं सफल हूँ / असफल हूँ
मैं कमजोर हूँ / मजबूत हूँ
ये सब वाक्य
असल में शरीर-मन के लिए सही हो सकते हैं।
लेकिन मैं इन्हें ‘आत्मा’ पर चढ़ा देता हूँ।
यही भ्रम है।
यही अध्यास है।
और इसी से जन्म लेता है—
तुलना, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, डर, अहंकार…
क्योंकि अब ‘मैं’ अनेक बन गया।”
‘उपाधि-नाश’ का सही अर्थ (बहुत महत्वपूर्ण)
“श्लोक कहता है—
‘तन्नाशे केवलो भवेत्’
अर्थात उपाधि-नाश होने पर ‘मैं’ एक हो जाता हूँ।
यहाँ एक बड़ा भ्रम नहीं होना चाहिए—
उपाधि-नाश का अर्थ
शरीर को नष्ट करना नहीं है,
दुनिया को मिटाना नहीं है।
उपाधि-नाश का अर्थ है—
उपाधि को ‘सत्य’ मानने की बुद्धि का नाश।
यानी दृष्टि बदलना।
घड़ा मौजूद रहे,
फिर भी आप जान लें—
आकाश बंटा नहीं है।
शरीर मौजूद रहे,
फिर भी आप जान लें—
‘मैं शरीर नहीं हूँ।’
यही ज्ञान है।
यही मुक्ति है।”
“आज का अभ्यास:
दिन में 2 बार 30 सेकंड—
बस तीन वाक्य धीरे-धीरे बोलिए:
शरीर में परिवर्तन है, मुझमें नहीं।
मन में तरंगें हैं, मैं साक्षी हूँ।
उपाधियाँ आती-जाती हैं, मैं स्थिर हूँ।
यही ‘उपाधि-नाश’ की शुरुआत है—
दृष्टि का परिवर्तन।”
“दोस्तों,
आकाश घट से सीमित नहीं होता—
बस सीमित दिखता है।
वैसे ही आत्मा
शरीर-मन से बंधती नहीं—
बस बंधी लगती है।
जब यह समझ पक्की हो जाती है—
तो अनेकता का शोर मिटता है,
और भीतर एक वाक्य बचता है:
मैं केवल हूँ। मैं एक हूँ।
Stay Sachetan…Stay Aware…
Stay Free.”
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