सचेतन- 09: आत्मबोध की यात्रा - “सब एक ही सत्य से बने हैं”
“कभी आपने सोचा है—
हम सब इतने अलग क्यों दिखते हैं?
कोई अमीर, कोई गरीब…
कोई मनुष्य, कोई पशु…
कोई देव, कोई साधारण…
लेकिन अगर भीतर से देखा जाए—
तो क्या हम सच में अलग हैं?”
सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिताः।
व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत्॥९॥
सरल अर्थ
“सच्चिदानंद स्वरूप,
सर्वत्र व्याप्त,
नित्य ब्रह्म (विष्णु) में
यह सारी विविध सृष्टि
कल्पना से प्रकट हुई है—
जैसे एक ही सोने से
कंगन, हार और अंगूठियाँ बनती हैं।”
आत्मबोध का आधार क्या है?
“शंकराचार्य यहाँ एक बहुत सूक्ष्म बात बताते हैं।
वे कहते हैं—
सबका आधार है
सच्चिदात्मा।
सत् — जो हमेशा है
चित् — जो हमेशा जानता है
आनंद — जो स्वभाव से पूर्ण है
यही आत्मा
हर नाम-रूप के भीतर
अनुस्यूत है—
अर्थात, हर जगह भीतर-ही-भीतर फैली हुई।”
‘विष्णु’ का अर्थ
“यहाँ ‘विष्णु’ का अर्थ
कोई विशेष मूर्ति नहीं है।
‘विष्णु’ का अर्थ है—
जो सबमें व्याप्त है।
शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि
विष्णु, शिव, ईश्वर—
ये नाम पूजा के लिए हैं।
सत्य एक ही है—
अद्वैत ब्रह्म।”
विविधता का रहस्य
“दुनिया में
असंख्य प्राणी हैं—
मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, देव…
ये सब क्या हैं?
शंकराचार्य कहते हैं—
ये सब ‘व्यक्तियाँ’ हैं,
सत्य नहीं।
ये सब
नाम और रूप हैं—
कल्पना से बने हुए।
सत्य क्या है?
जिस पर ये टिके हैं—
ब्रह्म।”
सोने और आभूषण का उदाहरण
“एक सुंदर उदाहरण दिया गया है—
सोना एक है।
लेकिन उससे बनते हैं—
कंगन, हार, अंगूठी।
नाम अलग हैं,
आकार अलग हैं,
उपयोग अलग है—
लेकिन वस्तु एक ही है—
सोना।
उसी तरह—
तुम, मैं, वह—
सब नाम-रूप अलग हैं,
लेकिन आधार एक है—
सच्चिदात्मा।”
सच्चिदात्मा का अर्थ क्या है?
“अगर यह समझ आ जाए—
तो जीवन में क्या बदलता है?
• अहंकार ढीला पड़ जाता है
• तुलना समाप्त होने लगती है
• घृणा और भय कम हो जाते हैं
क्योंकि तब
‘दूसरा’ कोई नहीं बचता।
आप किसी को देखते हैं—
और भीतर से जान लेते हैं—
यह भी वही है,
जो मैं हूँ।”
“दोस्तों,
आभूषण अलग-अलग हो सकते हैं,
लेकिन सोना एक है।
शरीर, मन, नाम अलग-अलग हो सकते हैं,
लेकिन आत्मा एक है।
यही आत्मबोध है—
यही अद्वैत है।
Stay Aware…
Stay One.”
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