सचेतन:बुद्धचरितम्-9 अभिनिष्क्रमण-3 (The Great Renunciation)
मुक्ति की राह पर पहला कदम
राजकुमार सिद्धार्थ ने दृढ़ निश्चय के साथ घोड़े की पीठ पर चढ़ते हुए सिंहनाद किया, "जब तक मैं जन्म और मृत्यु के चक्र का अंत नहीं देख लूँगा, तब तक मैं इस कपिलवस्तु नगर में वापस नहीं लौटूँगा!"
उनकी इस प्रतिज्ञा को सुनकर देवता भी प्रसन्न हो उठे। स्वर्ग से देवताओं ने आकर उनकी राह को रोशन करने का निश्चय किया। कुछ देवताओं ने अग्निरूप धारण कर मार्ग में प्रकाश फैलाया, ताकि अंधकार उनकी यात्रा में बाधा न बने।
रात की यात्रा, नई सुबह की ओर
कन्थक अश्व पूरी शक्ति से दौड़ पड़ा। ऐसा लग रहा था जैसे वह हवा से बातें कर रहा हो। राजकुमार की धुन इतनी प्रबल थी कि एक ही रात में उन्होंने अनेकों योजन (यानी कई सौ किलोमीटर) की दूरी तय कर ली। वे तेजी से अज्ञात की ओर बढ़ रहे थे—मोह, बंधन और सांसारिक सुखों को त्यागकर एक नयी रोशनी, एक नये सत्य की खोज में।
यह वही क्षण था जब राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने भव्य जीवन, राजमहल की ऐश्वर्यता और सुख-सुविधाओं को छोड़कर आत्मज्ञान की राह पकड़ ली। आगे चलकर यही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के रूप में प्रसिद्ध हुए और संसार को ज्ञान और करुणा का मार्ग दिखाया।
यह उनका "महाभिनिष्क्रमण" (महान प्रस्थान) था—एक ऐसी यात्रा, जिसने न केवल उनका जीवन बदला, बल्कि पूरे विश्व को नई दिशा दी।
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