सचेतन 3.20 : सिद्धासन के लिए : यम और नियम

योग के नैतिक और अनुशासनिक सिद्धांत

नमस्कार श्रोताओं, और स्वागत है इस हमारे विशेष नाद योग (योग विद्या) पर सचेतन के इस विचार के सत्र  में. सिद्धासन, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, एक ऐसा आसन है जो सभी सिद्धियों को प्रदान करता है। यमों में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है, नियमों में शौच श्रेष्ठ है, वैसे आसनों में सिद्धासन श्रेष्ठ है। स्वामी स्वात्माराम जी के अनुसार, जिस प्रकार केवल कुम्भक के समय कोई कुम्भक नहीं, खेचरी मुद्रा के समान कोई मुद्रा नहीं, नाद के समय कोई लय नहीं; उसी प्रकार सिद्धासन के समान कोई दूसरा आसन नहीं है।

यम और नियम: योग के आचरण और अनुशासन

योग के दो महत्वपूर्ण अंगों के बारे में, जिन्हें "यम" और "नियम" कहा जाता है। ये दोनों ही योग साधना के आधारभूत स्तंभ हैं। 

यम और नियम: योग के नैतिक और अनुशासनिक सिद्धांत

ये दोनों अंग योग साधना का आधार होते हैं और हमारे जीवन में नैतिकता, अनुशासन, और शुद्धता लाने में सहायक होते हैं। 

यम: नैतिक अनुशासन

यम का अर्थ है नैतिक अनुशासन और सामाजिक आचरण। यह उन सिद्धांतों का समूह है, जो एक योगी को समाज और स्वयं के प्रति उत्तरदायित्वों को समझने और उनका पालन करने में मार्गदर्शन करता है। यम पाँच होते हैं:

  1. अहिंसा (Ahimsa):

    • अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी के प्रति हिंसा न करना। यह शारीरिक, मानसिक, और वाणी द्वारा की जाने वाली हिंसा से बचने की शिक्षा देता है।

    • अहिंसा केवल दूसरों को नुकसान न पहुँचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने विचारों और भावनाओं को भी शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखने का आह्वान करता है।

  2. सत्य (Satya):

    • सत्य का अर्थ है सत्य बोलना और सत्य का पालन करना। यह हमें अपने शब्दों और कार्यों में सच्चाई बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

    • सत्य का पालन हमें समाज में विश्वास और पारदर्शिता स्थापित करने में मदद करता है।

  3. अस्तेय (Asteya):

    • अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। यह न केवल भौतिक वस्तुओं की चोरी से बचने की शिक्षा देता है, बल्कि दूसरों की इच्छाओं, विचारों, और ऊर्जा का भी आदर करने का संदेश देता है।

    • अस्तेय हमें सादगी और संतोष की भावना को बढ़ावा देता है।

  4. ब्रह्मचर्य (Brahmacharya):

    • ब्रह्मचर्य का अर्थ है इन्द्रियों का संयम और ऊर्जा का संरक्षण। यह हमें आत्म-नियंत्रण और संयम का अभ्यास करने की शिक्षा देता है।

    • ब्रह्मचर्य हमें शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में मार्गदर्शन करता है।

  5. अपरिग्रह (Aparigraha):

    • अपरिग्रह का अर्थ है गैर-लालच और संपत्ति का त्याग। यह हमें भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति से मुक्त होने और केवल आवश्यकता की चीजों पर निर्भर रहने की प्रेरणा देता है।

    • अपरिग्रह हमें मानसिक शांति और संतोष का अनुभव कराता है।

नियम: व्यक्तिगत अनुशासन

नियम का अर्थ है व्यक्तिगत अनुशासन और आत्म-अनुशासन। यह उन सिद्धांतों का समूह है, जो एक योगी को आत्म-शुद्धि और आत्म-नियंत्रण के मार्ग पर ले जाता है। नियम पाँच होते हैं:

  1. शौच (Shaucha):

    • शौच का अर्थ है शुद्धता। यह शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक शुद्धता की शिक्षा देता है।

    • शौच का पालन हमें हमारे विचारों, शब्दों, और कार्यों को शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखने में मदद करता है।

  2. संतोष (Santosha):

    • संतोष का अर्थ है संतुष्टि। यह हमें अपनी स्थिति में संतोष और संतुष्टि का अनुभव करने की प्रेरणा देता है।

    • संतोष का अभ्यास हमें आंतरिक शांति और संतुलन प्रदान करता है।

  3. तप (Tapas):

    • तप का अर्थ है आत्म-अनुशासन और कठिनाइयों को सहन करना। यह हमें आत्म-नियंत्रण और धैर्य का अभ्यास करने की शिक्षा देता है।

    • तप हमें हमारे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठिनाइयों का सामना करने और उन्हें पार करने की शक्ति देता है।

  4. स्वाध्याय (Svadhyaya):

    • स्वाध्याय का अर्थ है आत्म-अध्ययन। यह हमें आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास की दिशा में मार्गदर्शन करता है।

    • स्वाध्याय के माध्यम से हम अपने विचारों, भावनाओं, और कार्यों का विश्लेषण करते हैं और उन्हें सुधारने की कोशिश करते हैं।

  5. ईश्वरप्रणिधान (Ishvara Pranidhana):

    • ईश्वरप्रणिधान का अर्थ है ईश्वर में समर्पण। यह हमें अपनी इच्छाओं और अहंकार को त्याग कर ईश्वर की इच्छा में समर्पित होने की प्रेरणा देता है।

    • ईश्वरप्रणिधान हमें आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की दिशा में मार्गदर्शन करता है।

यम और नियम योग के आधार हैं। इनका पालन हमारे जीवन में नैतिकता, अनुशासन, और शुद्धता लाने में सहायक होता है। हमें अपने जीवन में यम और नियम के सिद्धांतों को अपनाकर अपने योग साधना को गहराई तक ले जाना चाहिए।

सिद्धासन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली योगासन है जिसमें यम और नियम से सभी सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं। इसका नियमित अभ्यास मन और शरीर को शुद्ध करता है और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर करता है। हमें इसे सावधानीपूर्वक और सही विधि से करना चाहिए। अगले सत्र में बात करेंगे कि कुम्भक के समय कोई कुम्भक नहीं, खेचरी मुद्रा के समान कोई मुद्रा नहीं, नाद के समय कोई लय नहीं; उसी प्रकार सिद्धासन के समान कोई दूसरा आसन नहीं है।

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