सचेतन 2.103 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - प्रार्थना से तीखी लपटोंवाले अग्निदेव शान्तभाव से जलने लगे

"हनुमान जी की लंका में लीला"

नमस्कार श्रोताओं! स्वागत है आपका "धर्म कथाएं" सचेतन के इस विचार के सत्र में। आज हम एक ऐसी कथा सुनाने जा रहे हैं जिसमें हनुमान जी के अद्वितीय पराक्रम और उनकी भक्ति का वर्णन है। ये वो समय है जब हनुमान जी ने लंका में प्रवेश किया और सीता माता से भेंट की। तो आइए, इस अद्भुत कथा की यात्रा शुरू करते हैं।

हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर राक्षसों ने उन्हें नगर में घुमाना शुरू किया। मृगनयनी सीता माता ने जब इस दृश्य को देखा, तो उनकी प्रार्थना से तीखी लपटोंवाले अग्निदेव शान्तभाव से जलने लगे, मानो वे हनुमान के मंगल की सूचना दे रहे हों। अग्नि की शिखाएं मानो प्रदक्षिणा कर रही थीं।

हनुमान जी के पिता वायुदेवता भी उस समय शीतल और सुखद बर्फीली हवा के समान बहने लगे, मानो वे देवी सीता के लिये स्वास्थ्यकारी हों।

उधर, पूँछ में आग लगाये जाने पर हनुमान जी सोचने लगे...

हनुमान जी (सोचते हुए) बोले अहो! यह आग सब ओर से प्रज्वलित होने पर भी मुझे जलाती क्यों नहीं है? इसमें इतनी ऊँची ज्वाला उठती दिखायी देती है, फिर भी यह मुझे पीड़ा नहीं दे रही। ऐसा लगता है जैसे मेरी पूँछ के अग्रभाग में बर्फ का ढेर-सा रख दिया गया हो।

हनुमान जी को याद आया कि श्रीराम के प्रभाव से समुद्र लांघते समय सागर में पर्वत का प्रकट होना भी आश्चर्यजनक था। तो क्या अग्निदेव भी श्रीराम के उपकार के लिये शीतलता नहीं प्रकट करेंगे?

निश्चय ही भगवती सीता की दया, श्रीरघुनाथ जी के तेज तथा वायुदेवता की मैत्री के प्रभाव से अग्निदेव हनुमान जी को जला नहीं रहे थे।

तदनन्तर, महाकपि हनुमान ने सोचा...

मेरे जैसे पराक्रमी पुरुष का यहाँ इन नीच निशाचरों द्वारा बाँधा जाना कैसे उचित हो सकता है? मुझे अवश्य इसका प्रतिकार करना चाहिए।

हनुमान जी ने अपने बंधनों को तोड़ा और बड़े वेग से ऊपर उछले। गर्जना करते हुए वे पर्वत-शिखर के समान ऊँचे नगरद्वार पर पहुँच गए, जहाँ राक्षसों की भीड़ नहीं थी।

हनुमान जी ने पर्वताकार होते हुए भी क्षणभर में बहुत छोटे और पतले हो कर अपने सारे बन्धनों को निकाल फेंका। बन्धनों से मुक्त होते ही वे फिर पर्वत के समान विशालकाय हो गए।

उन्होंने जब इधर-उधर दृष्टि डाली, तो फाटक के सहारे रखा हुआ एक काले लोहे का परिघ दिखायी दिया। महाबाहु पवनपुत्र ने उस परिघ को लेकर वहाँ के समस्त रक्षकों को फिर मार गिराया।

राक्षसों को मारकर रणभूमि में प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करने वाले हनुमान जी पुनः लंकापुरी का निरीक्षण करने लगे। जलती हुई पूँछ से जो ज्वालाओं की माला-सी उठ रही थी, उससे अलंकृत हुए वे वानरवीर तेजःपुञ्ज से देदीप्यमान सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे।

इस अद्भुत कथा को सुनने के लिए आपका धन्यवाद। "प्रकाश की गूंज" में हम फिर मिलेंगे एक नई आध्यात्मिक यात्रा के साथ। तब तक, ज्ञान और धैर्य की राह पर चलते रहें।

हनुमान जी ने अंततः समुद्र पार कर लंका से वापस लौटने का निर्णय लिया और सीता माता के संदेश को श्रीराम तक पहुँचाया। उनकी इस वीरता और साहस की कथा आज भी हमारे दिलों में जीवित है।

तो दोस्तों, यह थी हनुमान जी की वीरता की एक झलक। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलने वाले को किसी भी परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए। आशा है, आपको यह कथा पसंद आई होगी। 

श्रोताओं, यह थी हनुमान जी की लंका में लीला की अद्भुत कथा। उनके पराक्रम और भक्ति ने हमें सिखाया कि सच्चे भक्त और वीर को कोई भी बंधन रोक नहीं सकता। अगले एपिसोड में हम एक और रोचक कहानी लेकर आएंगे। तब तक के लिए, नमस्कार!


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सचेतन :68 ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान से संभव है

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-33 : बंदर और गौरैया की कथा-2

सचेतन :74 श्री शिव पुराण- शिव की भक्ति से दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश होता है।-2