सचेतन 2.57: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - काम (प्रेम) बड़ा टेढ़ा होता है

जिसके प्रति आप जैसे भी बँध जाते हैं वैसे ही उसके प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है। 

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।

रावण ने सीता जी से कहा की यदि महीने भर में यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा। और 

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद।

यों कहकर रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियों के समूह बहुत से बुरे रूप धरकर सीताजी को भय दिखलाने लगे। 

रावण ने सीता को दो मास की अवधि दिया और सीता का उसे फटकारा, फिर रावण ने सीता को धमकाया। सीता के ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावण ने उन प्रियदर्शना सीता को यह अप्रिय उत्तर दिया। लोक में पुरुष जैसे-जैसे स्त्रियों से अनुनय-विनय करता है, वैसे-वैसे वह उनका प्रिय होता जाता है; परंतु मैं तुमसे ज्यों-ज्यों मीठे वचन बोलता हूँ, त्योंही-त्यों तुम मेरा तिरस्कार करती जा रही हो। किंतु जैसे अच्छा सारथि कुमार्ग में दौड़ते हुए घोड़ों को रोकता है, वैसे ही तुम्हारे प्रति जो मेरा प्रेम उत्पन्न हो गया है, वही मेरे क्रोध को रोक रहा है।मनुष्यों में यह काम (प्रेम) बड़ा टेढ़ा है। वह जिसके प्रति बँध जाता है, उसी के प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है। 

‘सुमुखि! यही कारण है कि झूठे वैराग्य में तत्पर तथा वध और तिरस्कार के योग्य होने पर भी तुम्हारा मैं वध नहीं कर रहा हूँ। मिथिलेशकुमारी! तुम मुझसे जैसी-जैसी कठोर बातें कह रही हो, उनके बदले तो तुम्हें कठोर प्राणदण्ड देना ही उचित है। विदेहराजकुमारी सीता से ऐसा कहकर क्रोध के आवेश में भरे हुए राक्षसराज रावण ने उन्हें फिर इस प्रकार उत्तर दिया- सुन्दरि! मैंने तुम्हारे लिये जो अवधि नियुक्त की है, उसके अनुसार मुझे दो महीने और प्रतीक्षा करनी है। तत्पश्चात् तुम्हें मेरी शय्या पर आना होगा। अतः याद रखो यदि दो महीने के बाद तुम मुझे अपना पति बनाना स्वीकार नहीं करोगी तो रसोइये मेरे कलेवे के लिये तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे। 

राक्षसराज रावण के द्वारा जनकनन्दिनी सीता को इस प्रकार धमकायी जाती देख देवताओं और गन्धर्वो की कन्याओं को बड़ा विषाद हुआ। उनकी आँखें विकृत हो गयीं। तब उनमें से किसी ने ओठों से, किसी ने नेत्रों से तथा किसी ने मुँह के संकेत से उस राक्षस द्वारा डाँटी जाती हुई सीता को धैर्य बँधाया। उनके धैर्य बँधाने पर सीता ने राक्षसराज रावण से अपने सदाचार (पातिव्रत्य) और पति के शौर्य के अभिमान से पूर्ण हितकर वचन कहा— निश्चय ही इस नगर में कोई भी पुरुष तेरा भला चाहने वाला नहीं है, जो तुझे इस निन्दित कर्म से रोके। 

जैसे शची इन्द्र की धर्मपत्नी हैं, उसी प्रकार मैं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम की पत्नी हूँ। त्रिलोकी में तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो मन से भी मुझे प्राप्त करने की इच्छा करे। नीच राक्षस! तूने अमित तेजस्वी श्रीराम की भार्या से जो पाप की बात कही है, उसके फलस्वरूप दण्ड से तू कहाँ जाकर छुटकारा पायेगा?


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