सचेतन 2.56: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - जो अपनी स्त्रियों से संतुष्ट नहीं रहता उनकी बुद्धि धिक्कार देने योग्य है

उस चपल इन्द्रियों वाले चञ्चल पुरुष को परायी स्त्रियाँ पराभव को पहुँचा देती हैं उसे फजीहत में डाल देती हैं।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥

तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥

अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥

सीता जी ने कहा की निशाचर! तुम श्रेष्ठ धर्म की ओर दृष्टिपात करो और सत्पुरुषों के व्रत का अच्छी तरह पालन करो। जैसे तुम्हारी स्त्रियाँ तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी तुम्हें रक्षा करनी चाहिये। तुम अपने को आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्रियों में अनुरक्त रहो। जो अपनी स्त्रियों से संतुष्ट नहीं रहता तथा जिसकी बुद्धि धिक्कार देने योग्य है, उस चपल इन्द्रियों वाले चञ्चल पुरुष को परायी स्त्रियाँ पराभव को पहुँचा देती हैं उसे फजीहत में डाल देती हैं। 

क्या यहाँ सत्पुरुष नहीं रहते हैं अथवा रहने पर भी तुम उनका अनुसरण नहीं करते हो? जिससे तुम्हारी बुद्धि ऐसी विपरीत एवं सदाचारशून्य हो गयी है ?

अथवा बुद्धिमान् पुरुष जो तुम्हारे हित की बात कहते हैं, उसे निःसार मानकर राक्षसों के विनाशपर तुले रहने के कारण तुम ग्रहण ही नहीं करते हो? जिसका मन अपवित्र तथा सदुपदेश को नहीं ग्रहण करनेवाला है, ऐसे अन्यायी राजा के हाथ में पड़कर बड़े-बड़े समृद्धिशाली राज्य और नगर नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार यह रत्नराशि से पूर्ण लंकापुरी तुम्हारे हाथ में आ जाने से अब अकेले तुम्हारे ही अपराध से बहुत जल्द नष्ट हो जायगी। रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियों को प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार तुमने जिन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, वे तुम्हें पापी कहेंगे और बड़ा अच्छा हुआ, जो इस आततायी को यह कष्ट प्राप्त हुआ’ ऐसा कहकर हर्ष मनायेंगे। 

जैसे प्रभा सूर्य से अलग नहीं होती, उसी प्रकार मैं श्रीरघुनाथजी से अभिन्न हूँ। ऐश्वर्य या धन के द्वारा तुम मुझे लुभा नहीं सकते। जगदीश्वर श्रीरामचन्द्रजी की सम्मानित भुजा पर सिर रखकर अब मैं किसी दूसरे की बाँह का तकिया कैसे लगा सकती हूँ ? जिस प्रकार वेदविद्या आत्मज्ञानी स्नातक ब्राह्मण की ही सम्पत्ति होती है, उसी प्रकार मैं केवल उन पृथ्वीपति रघुनाथजी की ही भार्या होनेयोग्य हूँ। रावण! तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि जिस प्रकार वन में समागम की वासना से युक्त हथिनी को कोई गजराज से मिला दे, उसी प्रकार तुम मुझ दुःखिया को श्रीरघुनाथजी से मिला दो।  यदि तुम्हें अपने नगर की रक्षा और दारुण बन्धन से बचने की इच्छा हो तो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को अपना मित्र बना लेना चाहिये; क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं।

भगवान् श्रीराम समस्त धर्मो के ज्ञाता और सुप्रसिद्ध शरणागतवत्सल हैं। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो उनके साथ तुम्हारी मित्रता हो जानी चाहिये। तुम शरणागतवत्सल श्रीराम की शरण लेकर उन्हें प्रसन्न करो और शुद्धहृदय होकर मुझे उनके पास लौटा दो। इस प्रकार मुझे श्रीरघुनाथजी को सौंप देने पर तुम्हारा भला होगा। इसके विपरीत आचरण करने पर तुम बड़ी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे।

सठ सूनें हरि आनेहि मोही।अधम निलज्ज लाज नहिं तोही। 

रे पापी! तू मुझे सूने में हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती?

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन। 

अपने को जुगनू के समान और रामचंद्रजी को सूर्य के समान सुनकर और सीताजी के कठोर वचनों को सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्से में आकर बोला

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥

नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥

-सीता! तूने मेरा अपनाम किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा। नहीं तो (अब भी) जल्दी मेरी बात मान ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा।


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