सचेतन 2.39: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सर्वार्थसिद्धि की प्राप्ति है रामायण कथा

सुन्दरकाण्ड - सर्वार्थसिद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है। राम की जीवन-यात्रा के सात काण्ड- बालकाण्ड, अयोध्यकाण्ड, अरण्यकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, लङ्काकाण्ड और उत्तरकाण्ड। लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप में  सुन्दरकाण्ड मानवीय जीवन में आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला है।कहते हैं की  हे रघुनाथ जी आप सबके अंतरात्मा हैं। 

हनुमान जी उचित ज्ञान और प्रभु के आशीर्वाद से सब कुछ कर सकते हैं और यह बात सबको प्रिय भी लगती है। जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।

अंतरात्मा में राम की भक्ति ही हनुमान का रूप है। राम का इतिहास सनातन और अप्रमेय है जिसके प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है यह हर काल में मौजूद था और रहेगा।

हर कार्य में लक्ष्य और विकल्प दोनों होना चाहिए, हनुमान जी के लक्ष्य में विकल्प था की मैं लंकापुरी  जाऊँगा यदि लंका में जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखूँगा तो राक्षसराज रावण को बाँधकर लाऊँगा।

आपके कार्य में उत्कृष्टता स्वाभाविक होनी चाहिये।हनुमान्जी की पिंगल नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होती है।

उत्कृष्टता के प्रदर्शन में विशेष उपमा होती है कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से समुद्र में बहुत ऊँची-ऊँची तरंगों को आकर्षित करते हुए सीता माता की खोज में आगे बढ़ रहे थे 

हनुमान जी अप्रत्यक्ष उपमान अलंकार हैं।  हनुमान जी से आप सीख ले कर सिर्फ़ कर्म को विशिष्टता और उत्कृष्टता के साथ करते रहें। 

वसुधैव कुटुंबकम का एकमात्र कल्याण की आकांक्षा रखें क्षीर सागर और मैनाक पर्वत अपना सनातन धर्म समझकर हनुमान जी को विश्राम करने की पेशकश की 

प्रत्युपकार  करना धर्म है। सतयुग में पर्वतों के भी पंख होते थे, वे  भी गरुड़ के समान वेगशाली होकर संपूर्ण दिशा में उड़ते फिरते थे। 

अवलोकन से विज्ञान तक , विश्वकर्मा की बनायी हुई लंका मानो उनके मानसिक संकल्प से रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी।

जीवन में किसी घटना के होने से बचने के लिए प्रतीक्षा करना चाहिए।वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनी के दर्शन के लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे।

स्त्री पर क्रोध नहीं किया जाता है। निशाचरी लंका द्वारा हनुमान जी को लंका पूरी में प्रवेश करने से रोकना। निशाचरी लंका द्वारा गूढ़ रहस्य का बखान, साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजी ने  निशाचरी लंका को वरदान दिया था 

रावण तथा अन्यान्य राक्षसों के घरों में सीताजी की खोज। कपिकुञ्जर हनुमान् जी रावण के महल को देखकर मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करने लगे।

रावण के गुप्त भवन में भी कपिवर हनुमान्जी जा पहुँचे नितांत शुद्ध रखने की परंपरा से अंतःपुर की विशिष्टता होती है 

तपस् में जीवन के शाश्वत मूल्यों की प्राप्ति होती है हनुमान् जी के द्वारा पुनः पुष्पक विमान का दर्शन

रावण की हवेली स्त्रियों से प्रकाशित एवं सुशोभित होता था। स्वर्ग जैसे भोगावशिष्ट पुण्य इन सुन्दरियों के रूपमें एकत्र थी 

क्योंकि वहाँ उन युवतियों के तेज, वर्ण और प्रसाद स्पष्टतः सुन्दर प्रभावाले महान् तारों के समान ही सुशोभित होते थे।


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