सचेतन 2.20: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सफलता के लिए शक्ति के तीन रूप - इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति

हनुमान जी की छाया को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सिंहिका राक्षसी  ने पकड़ ली। 

सीता माता की खोज में वायु के समान हनुमान जी आगे बढ़ रहे थे और बड़े-बड़े बादल से यह दृश्य से अद्भुत शोभायमान हो रहा था।

इस तरह जाते हुए हनुमान जी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली विशालकाया सिंहिका नामवाली राक्षसी ने देखा। देखकर वह मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी- आज दीर्घकाल के बाद यह विशाल जीव मेरे वश में आया है। इसे खा लेने पर बहुत दिनों के लिये मेरा पेट भर जायगा। अपने हृदय में ऐसा सोचकर उस राक्षसी ने हनुमान् जी की छाया पकड़ ली। 

छाया पकड़ी जाने पर वानरवीर हनुमान् ने सोचा—’अहो! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़ के सामने मेरा पराक्रम रुक सा गया है। जैसे प्रतिकूल हवा चलने पर समुद्र में जहाज की गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है’। 

यही सोचते हुए कपिवर हनुमान् ने उस समय अगल-बगल में, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली। इतने ही में उन्हें समुद्र के जल के ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया। उस विकराल मुखवाली राक्षसी को देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे-वानरराज सुग्रीव ने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीव की चर्चा की थी, वह निःसंदेह यही है। 

तब बुद्धिमान् कपिवर हनुमान जी ने यह निश्चय करके कि वास्तव में यही सिंहिका है, वर्षाकाल के मेघ की भाँति अपने शरीर को बढ़ाना आरम्भ किया। इस प्रकार वे विशालकाय हो गये, उन महाकपि के शरीर को बढ़ते देख सिंहिका ने अपना मुँह पाताल और आकाश के मध्यभाग के समान फैला लिया और मेघों की घटा के समान गर्जना करती हुई उन वानरवीर की ओर दौड़ी। 

हनुमान जी ने उसका अत्यन्त विकराल और बढ़ा हुआ मुँह देखा। उन्हें अपने शरीर के बराबर ही उसका मुँह दिखायी दिया। उस समय बुद्धिमान् महाकपि हनुमान् ने सिंहिका के मर्मस्थानों को अपना लक्ष्य बनाया। 

तदनन्तर वज्रोपम शरीर वाले महाकपि पवनकुमार अपने शरीर को संकुचित करके उसके विकराल मुख में आ गिरे। उस समय सिद्धों और चारणों ने हनुमान जी को सिंहिका के मुख में उसी प्रकार निमग्न होते देखा, जैसे पूर्णिमा की रात में पूर्ण चन्द्रमा राहु के ग्रास बन गये हों। मुख में प्रवेश करके उन वानरवीर ने अपने तीखे नखों से उस राक्षसी के मर्मस्थानों को विदीर्ण कर डाला। इसके पश्चात् वे मन के समान गति से उछलकर वेगपूर्वक बाहर निकल आये। 

हमें यह जानना चाहिए की शक्ति के तीन रूप हैं, इच्छा शक्ति - इच्छा या इच्छा की ऊर्जा, ज्ञान शक्ति - ज्ञान की ऊर्जा, क्रिया शक्ति - क्रिया की ऊर्जा। सभी सफलता के लिए, शक्ति के इन तीनों रूपों को शामिल करने की आवश्यकता है। इन ऊर्जाओं की प्रक्रिया और परस्पर क्रिया लगातार हमारे भीतर ऊर्जा चलती रही है। आकांक्षा, क्रिया और ज्ञान की शक्ति। (The Power of Aspiration, Action and Knowledge)

यदि हम किसी कार्य को सफल करना चाहते हैं तो इसके लिए चेतना चाहिए जैसे हनुमान जी सिंहिका राक्षसी के बारे में सुग्रीव के द्वारा की  गई छायाग्राही अद्भुत जीव चर्चा याद थी। यह ज्ञान की शक्ति है। इच्छा शक्ति यानी राहत पाने की इच्छा, आपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की इक्षा। इसके बाद क्रिया शक्ति आती है जो आपको गति देती है की कुछ करो जिससे सफलता मिलेगी। 

दैव के अनुग्रह, स्वाभाविक धैर्य तथा कौशल से उस राक्षसी को मारकर वे मनस्वी वानरवीर पुनः वेग से बढ़कर बड़े हो गये। हनुमान् जी ने प्राणों के आश्रयभूत उसके हृदयस्थल को ही नष्ट कर दिया, अतः वह प्राणशून्य होकर समुद्र के जल में गिर पड़ी। विधाता ने ही उसे मार गिराने के लिये हनुमान जी को निमित्त बनाया था।


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