सचेतन 254: शिवपुराण- वायवीय संहिता - योग गति में विघ्न

विघ्नों के शांत होने पर उपसर्ग (विशेषता या परिवर्तन) उत्पन्न हो जाते हैं। 

उपमन्यु बोले ;- हे केशव! आलस्य, व्याधि, प्रमाद, स्थान, संशय, चित्त का एकाग्र न होना, अश्रद्धा, दुख, वैमनस्य आदि योग में पड़ने वाले विघ्न हैं। इन विघ्नों को सदा शांत करते रहना चाहिए। इन सब विघ्नों के शांत होने पर छः उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं। प्रतिमा, श्रवण, वार्ता, दर्शन, आस्वादन, वेदना आदि भोग के विषय हैं। यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो जाने पर भी विप्रकृष्ट (खींचकर दूर किया हुआ/दूरस्थ) नहीं होता, यही प्रतिमा है।

यत्न के बिना जब सबकुछ हमें सुनाई देने लगता है उसे श्रवण कहते हैं। सभी प्राणियों की बात को जानना और समझ लेना वार्ता कहलाता है। बिना कोई कोशिश किए जब सबकुछ आसानी से दिखाई देने लगे तो उसे दर्शन कहते हैं। दिव्य पदार्थों के स्वाद का नाम ‘आस्वादन' है। वेदना को सभी प्रकार के स्पर्शो का ज्ञान माना जाता है। योगी उपसर्ग पाकर सिद्ध हो जाता है।

लेकिन योग के पथ पर चलते हुए कुछ बाधाएं हैं जो विक्षेप ला सकते हैं।

1.व्याधि: अर्थात शारीरिक बीमारी, यह योग के पथ में पहली बाधा है।

2.स्त्यान: अर्थात मानसिक बीमारी, मन से विक्षिप्त होना अथवा सुनने, समझने और मानने की क्षमता न होना स्त्यान है।  

कई बार ऐसा होता है की साधारणतः आप सही रहते है पर जैसे ही आप किसी ध्यान शिविर में आते है तो आप बीमार हो जाते है, ऐसे ही कभी आप ध्यान करने बैठते हैं तब शरीर दुखने लगता है, बैचेनी होती है।  सिनेमा देखने में ऐसा कतई नहीं होता।  यह भी एक तरह की बाधा ही है।

3. संशय : अर्थात संदेह, मन में तीन तरह के संशय आ सकते है।

स्वयं पर संशय :  अपने ऊपर संशय जैसे "क्या मैं उतना अच्छा हूँ? क्या मैं इतना कर सकता हूँ? मुझे नहीं लगता मैं ये कर सकता हूँ।  इसी प्रकार किसी ध्यान शिविर में और सभी को अच्छे से ध्यान करता देख कर भी यह सोच सकते हो की मैं ही परेशान हूँ, मेरा ही ध्यान नहीं लग रहा है, बाकी सब ध्यान कर पा रहे हैं। मुझे लगता है की मैं तो कभी भी ध्यान नहीं कर पाउँगा।

योग के मार्ग पर इस प्रकार के संशय उठ सकते है।

ध्यान प्रक्रिया पर संशय: "क्या यह ध्यान प्रक्रिया ठीक भी है? इससे कोई फायदा होगा मुझे? हो सकता है मेरे लिए कोई और प्रक्रिया ठीक हो।" ऐसे सभी संशय भी मन को परेशान कर सकते हैं। 

गुरु पर संशय: गुरु पर भी कई तरह के संशय उठ सकता है जैसे कि "ये गुरूजी स्वयं क्या करते है? इन्हें मुझसे क्या चाहिए होगा?" ऐसे सभी संशय भी हो सकते हैं

संशय तीसरी बाधा है। 

4. प्रमाद: यह जानते हुए भी की कुछ बहुत गलत है, फिर भी वही करना प्रमाद है। तुम्हें पता हो कि यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है फिर भी तुम वही करते रहते हो, इसे प्रमाद कहते है। इसी तरह तुम्हे अच्छे से पता हो की तुम्हे कुछ करना है और तुम फिर भी वह न करो। 

तुम्हे अच्छे से पता है की तुम्हे टैक्स देना है पर फिर भी तुम कर न चुकाओ, यही प्रमाद है। जैसे यदि तुम बीमार हो और तुम्हे मीठा खाने का मना हो, फिर भी तुम मीठा खाओ, वह प्रमाद है। इस तरह से लापरवाही बरतना और सजगता न बनाये रखना भी एक बाधा है।

5. आलस्य: अर्थात शरीर की जड़ता। ऐसा भी हो सकता है की आप बहुत कुछ करते हो पर जब योग, आसन और प्राणायाम करने के समय पर मन नही करता, इस तरह का आलस्य जीवन के किसी भी क्षेत्र में हो सकता है। प्रमाद में तुम जानबूझकर कुछ नहीं करते हो पर आलस्य में शरीर की जड़ता तुम्हें कुछ नहीं करने देती है।

6. अविरति: किसी भी इंद्रिय विषय-वस्तु में फंसे रहना और उससे बाहर न निकलना अविरति है।  जैसे तुम्हें भूख लगी हो तब तुम भोजन करो परन्तु पूरे दिन यदि भोजन के बारे में ही सोचते रहो तब यह अविरति है। ऐसे ही तुम्हें कुछ सुन्दर प्राकृतिक दृश्य देखने का मन हो तो, देखो और खत्म करो।  हमेशा कुछ देखने के बारे में ही सोचते रहना निरर्थक है। 

हमारी इन्द्रियों का जो क्रिया कलाप है वह कुछ सीमित समय के लिए होना चाहिए और फिर वह समाप्त हो जाना चाहिए। परन्तु ऐसे किसी भी इन्द्रिय क्रिया कलाप को लगातार करते रहना या चौबीस घंटे उसी के बारे में सोचते रहना अविरति है। 

तुम भोजन करो पर उसके बाद भोजन के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है।  ऐसे ही तुम सम्भोग भी करो तो उसे पूरे दिन मन में लेकर घूमने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे किसी भी इंद्रिय क्रिया कलाप से अपने आपको अलग न कर पाना अविरति है। 

अविरति तुम्हें केंद्रित नहीं होने देती, मन को इधर उधर खींचती रहती है। 




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