सचेतन 103 : श्री शिव पुराण- शतरुद्र संहिता- तत्पुरुष रूप कर्म, करण , सम्प्रदान, अपादान और सम्बन्ध को दर्शाता है

भगवद गीता के अध्याय २ का ४७ वा श्लोक है, जब अर्जुन रणभूमि पर अपने सगे सम्बन्धी को देखकर, युद्ध छोड़ देना चाहते है, तब भगवान उसे गीता का उपदेश देते हैं जिसको सम्पूर्ण गीता का सार माना जाता है। कहते हैं की अगर आप इस तत्व को जान लोगे तो आपको दूसरा कुछ समझने की जरूरत ही नही पड़ेगी और सफलता आपके पीछे दोड़ेगी। इतना ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र में जीत आप की होगी। 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन-work is worship quotes

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठा में नहीं। वहाँ ( कर्ममार्ग में ) कर्म करते हुए तेरा फल में कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्था में कर्म फल की इच्छा नहीं होनी चाहिये।

यदि कर्मफल में तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफल प्राप्ति का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्तिका कारण तू मत बन।

क्योंकि जब मनुष्य कर्मफल की कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफल रूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है।

यदि कर्म फल की इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्तिप्रीति नहीं होनी चाहिये।

भगवान शिव का तत्पुरुष स्वरूप कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, संबंध और 

अधिकरण से हमसभी को स्वतंत्रता दिलाता है।

"कर्म" का शाब्दिक अर्थ है "काम" या "क्रिया" और भी मोटे तौर पर यह निमित्त और परिणाम तथा क्रिया और प्रतिक्रिया कहलाता है, जिसके बारे में हम सभी का मानना है यह सभी चेतना को नियंत्रित करता है।

कर्म भाग्य नहीं है, आदमी मुक्त होकर कर्म करता जाए, इससे उसके भाग्य की रचना होती रहेगी। वेदों के अनुसार, यदि हम अच्छाई बोते हैं, हम अच्छाई काटेंगे, अगर हम बुराई बोते हैं, हम बुराई काटेंगे। संपूर्णता में किया गया हमारा कार्य और इससे जुड़ी हुई प्रतिक्रियाएं तथा पिछले जन्म का संबंध कर्म से है, ये सभी हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं। कर्म की विजय बौद्धिक कार्य और संयमित प्रतिक्रिया में निहित है। सभी कर्म तुरंत ही पलटकर वापस नहीं आते हैं। कुछ जमा होते हैं और इस जन्म या अन्य जन्म में अप्रत्याशित रूप से लौट कर आते हैं।

तत्पुरुष स्वरूप करण है यानी जब हम कोई भी कार्य की सिद्ध कर लेते हैं तो  साधक कहलाते हैं। जैसे कोई निरन्तर गाड़ी को चलाते चलाते एक कुशल चालक बन जाता है। कर्म में कुशलता आ जाने को ही  करण कहते हैं। 

तत्पुरुष स्वरूप समझ लेने के उपरांत वह सभी उपाय या माध्यम या कारक समझ आने लगता है जिससे हमारे कर्म का लक्ष्य स्पष्ट दिखने लगता है। हम जब अपने काम को स्पष्ट और अति साधारण और सबके समझने योग्य बन लेते हैं या उस काम को या अपने विचार को व्यक्त कर पाते हैं तो उसको सम्प्रदान कहते हैं। 

हम कर्म तो करते रहते हैं और हमारी कामना बढ़ती जाती है को खूब सारा धन हो जाये नाम हो जाये फिर हम वासना के शिकार होजते हैं और वहीं जब कर्म फल पर कभी अधिकार नहीं होने के कारण यथोचित परिणाम नहीं मिलता तो निराशा, हताशा हो जाती है। कर्म के फल से कैसे अपने आप को अलग करेंगे यह तत्पुरुष स्वरूप के अपादान स्थिति को दर्शाता है। अपादान यानी किसी रूप से किन्हीं दो वस्तुओं के अलग होने का बोध। 

कर्म की सही सिद्धि तब तक संभव नहीं है जब तक हमारा स्वयं का 'सम्बन्ध' उसके साथ नहीं बना हो। सम्बन्ध यानी 'सम' का अर्थ सम्यक् होता है।'सम्यक्' का अर्थ पूरी तरह से, चारों ओर से अथवा परिपूर्ण।अर्थात सम्बन्ध शब्द का अर्थ होता है, 'चारों ओर से बंधन",'सब प्रकार से बंधन' अथवा 'परिपूर्ण बंधन' अथवा '१००% बंधन'। 

तत्पुरुष स्वरूप सम्बन्ध को दर्शाता है यानी वह स्थिति जिसमें कोई किसी के साथ जुड़ा बँधा या लगा रहता है।


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