सचेतन :79 श्री शिव पुराण- द्वेष से दुःख होता है


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केशव के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।  

एक गरीब आत्म छवि होना ईर्ष्या का एक और कारण है। सामान्य और असामान्य: ईर्ष्या सबसे अच्छा दो मुख्य उदाहरण है। परिवार ईर्ष्या, सहोदर स्पर्द्धा ईर्ष्या के इस प्रकार के एक ट्रेडमार्क विशेषता है। असामान्य ईर्ष्या अक्सर, रुग्ण मानसिक रोग, हो गया हो या चिंतित ईर्ष्या के कारण होता है। ईर्ष्या दो लोगों के एक सामाजिक या व्यक्तिगत संबंधों का हिस्सा है। 

द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । विशेष— योगशास्त्र में द्वेष उस भाव को कहा गया है जो दुःख का साक्षात्कार होने पर उससे या उसके कारण से हटने या बचने की प्रेरणा करता है। द्वेष का भाव चिढ़, शत्रुता, वैर से है। 

भगवान के बारे में कहा जाता है की वो राग-द्वेष से परे है पर अपने भक्तों से प्रेम करता है और उनपर कृपा करता है।

चित्त मन का सबसे भीतरी आयाम है, और राग-द्वेष का संबंध उस चीज से है जिसे हम चेतना कहते हैं। अगर आपका मन सचेतन हो गया, अगर आपने चित्त पर एक खास स्तर का सचेतन नियंत्रण पा लिया, तो आपकी पहुंच अपनी चेतना तक हो जाएगी तो हम राग-द्वेष का नियंत्रण केआर सकते हैं। 

हमारी प्रत्येक इन्द्रिय प्रत्येक विषय के राग-द्वेष में अलग-अलग स्थिति के साथ रहता है।  तात्पर्य यह है कि प्रत्येक इन्द्रिय-(श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण-) के प्रत्येक विषय-(शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-)। इन्द्रिय में अनुकूलता और प्रतिकूलता की मान्यता होती है जिससे मनुष्य के राग-द्वेष भी अनुकूलता और प्रतिकूलता होते हैं। 

इन्द्रियके विषयमें अनुकूलता का भाव होने पर मनुष्यका उस विषय में 'राग' हो जाता है और प्रतिकूलता का भाव होने पर उस विषय में 'द्वेष' हो जाता है।वास्तवमें देखा जाय तो राग-द्वेष इन्द्रियों के विषयों में नहीं रहते। यदि विषयों में राग-द्वेष स्थित होते तो एक ही विषय सभी को समान रूप से प्रिय अथवा अप्रिय लगता। परन्तु ऐसा होता नहीं; जैसे--वर्षा किसानको तो प्रिय लगती है, पर कुम्हारको अप्रिय। एक मनुष्यको भी कोई विषय सदा प्रिय या अप्रिय नहीं लगता; जैसे--ठंडी हवा गर्मी में अच्छी लगती है, पर सर्दी में बुरी। इस प्रकार सब विषय अपने अनुकूलता या प्रतिकूलता के भाव से ही प्रिय अथवा अप्रिय लगते हैं अर्थात् मनुष्य विषयों में अपना अनुकूल या प्रतिकूल भाव करके उनको अच्छा या बुरा मानकर राग-द्वेष कर लेता है। इसलिये भगवान ने राग-द्वेष को प्रत्येक इन्द्रिय के प्रत्येक विषय में स्थित बताया है।

वास्तवमें राग-द्वेष माने हुए 'अहम्'-(मैं-पन-) में रहते हैं । शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध ही अहम् कहलाता है। अतः जब तक शरीर से माना हुआ सम्बन्ध रहता है, तब तक उसमें राग द्वेष रहते हैं और वे ही राग-द्वेष, बुद्धि, मन, इन्द्रियों तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें प्रतीत होते हैं। 

भगवान हमेंशा अपने  साधक को आश्वासन देते हैं कि राग-द्वेष की वृत्ति उत्पन्न होने पर उसे साधन और साध्य से कभी निराश नहीं होना चाहिये, अपितु राग-द्वेष की वृत्ति के वशीभूत होकर उसे किसी कार्य में प्रवृत्त अथवा निवृत्त नहीं होना चाहिये।




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