सचेतन :68 ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान से संभव है
सचेतन :68 श्री शिव पुराण- ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान से संभव है #RudraSamhita जब आपके आंतरिक शरीर में ऋषि जैसे विशिष्ट व्यक्ति के समान अपकी विलक्षण एकाग्रता हो जाएगा तो उसके बल पर गहन ध्यान में आप विलक्षण शब्दों के दर्शन करके उनके गूढ़ अर्थों को जान सकेंगे। शब्द की सिद्धि के बारे में यजुर्वेद में बताया गया है। जिसके ज्ञान से आप दिव्यमय हो सकते हैं और विश्वपालक भगवान का और स्वयं का एक अद्भुत व सुंदर रूप देख सकते हैं । 'अकार' उनका मस्तक और आकार ललाट है। इकार दाहिना और ईकार बायां नेत्र है। उकार दाहिना और ऊकार बायां कान है। ऋकार दायां और ऋकार बायां गाल है। ऌ, र्लिं उनकी नाक के छिद्र हैं। एकार और ऐकार उनके दोनों होंठ हैं। ओकार और औकार उनकी दोनों दंत पक्तियां हैं। अं और अः देवाधिदेव शिव के तालु हैं। 'क' आदि पांच अक्षर उनके दाहिने पांच हाथ हैं और 'च' आदि बाएं पांच हाथ हैं। 'त' और 'ट' से शुरू पांच अक्षर उनके पैर हैं। पकार पेट है, फकार दाहिना और बकार बायां पार्श्व भाग (अर्धनारीश्वर का एक पार्श्व स्त्री का तथा दूसरा पुरुष का) है। ...
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