सचेतन :15. श्रीशिवपुराण- भक्ति से ईश्वर से भेंट होता है


सचेतन :15. श्रीशिवपुराण- भक्ति से ही भगवान का मिलन संभव है।

Sachetan: God's meeting is possible with devotion.

विद्येश्वर संहिता

प्रचंड कलियुग आने पर मनुष्य पुण्य कर्मों से दूर रहेंगे, इस युग में परोपकार के समान दूसरा कोई धर्म नहीं होगा। अतः ऋषि मुनियों ने श्री सूत जी से आग्रह किया की जिस छोटे-से उपायसे इन सबके पापों को तत्काल नाश हो जाय, उसे इस समय कृपापूर्वक बताइये; क्योंकि आप समस्त सिद्धान्त के ज्ञाता हैं। 

व्यासजी कहते हैं - उन भावितात्मा मुनियों की यह बात सुनकर सूतजी मन- ही मन भगवान् शंकर का स्मरण करके साध्य-साधन आदिका विचार करते हुए तथा श्रवण, कीर्तन और मनन- इन तीन साधनों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन के बारे में बताया। 

पहला कानों के द्वारा भगवान के गुणों और लीलाओं का श्रवण करना, दूसरा वाणी द्वारा सदा प्रभु नाम का जाप करना और तीसरा मन के द्वारा उन्हीं के स्वरूप का मनन करना। यदि व्यक्ति सदा यह तीन साधन करता रहे तो उसे शीघ्र ही परम तत्व का बोध हो सकता है। 

व्यासजी कहते हैं - सूतजीका यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले– 'अब आप हमें वेदान्तसार-सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण- की कथा सुनाइये।'

सूतजीने कहा- आप सब महर्षिगण रोग- शोक से रहित कल्याणमय भगवान् शिवका स्मरण करके पुराण प्रवर शिवपुराण की, जो वेद का सार-तत्त्वसे प्रकट हुआ है, कथा सुनिये। 

शिव पुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य-इन तीनों का प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदान्तवेद्यं सद्वस्तु का विशेष रूप से वर्णन है। इस वर्तमान कल्प में जब सृष्टि कर्म आरम्भ हुआ था, उन दिनों छः कुलों के महर्षि परस्पर वाद-विवाद करते हुए कहने लगे- 'अमुक वस्तु सबसे उत्कृष्ट है और अमुक नहीं है।' उनके इस विवाद ने अत्यन्त महान रूप धारण कर लिया। तब वे सब-के-सब अपनी शंका के समाधान के लिये सृष्टिकर्ता अविनाशी ब्रह्माजीके पास गये और हाथ जोड़कर विनय भरी वाणी में बोले-'प्रभो! आप सम्पूर्ण जगत को  धारण-पोषण करने वाले तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। हम यह जानना चाहते हैं कि सम्पूर्ण तत्वों से परे परात्पर पूर्ण पुरुष कौन हैं ?'

कहते हैं की ईश्वर आनंद स्वरूप है। उस महान ईश्वर तक जब मुँह से बखान कि गयी, वाणी से बोली गयी कथा और मन से भी भेजी गयी कथा उन तक नही पहुंच पाती है। अर्थात जिसका वर्णन वाणी तथा मन भी नही कर सकते हैं, उस आनंद स्वरूप ब्रह्म को जानने वाले किसी से भयभीत नही होना चाहिए। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि वह आपको आनंद स्वरूप ब्रह्म का ध्यान कर सांसारिक भय से मुक्त करायें।

ब्रह्माजीने उन छः कुलों के महर्षि जो परस्पर वाद-विवाद कर रहे थे उनसे कहा की - जहाँ से मन सहित वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् समस्त भूतों एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुआ है, वे ही ये देव, महादेव सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं। ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं। 

भक्ति से ही इनका साक्षात्कार होता है। दूसरे किसी उपाय से कहीं इनका दर्शन नहीं होता। रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्ति भाव से उनका दर्शन करना चाहते हैं। भगवान् शिव में भक्ति होने से मनुष्य संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है। देवता की कृपा प्रसाद से उनमें भक्ति होती है और भक्ति से देवता की कृपा प्रसाद प्राप्त बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है। इसलिये तुम सब ब्रह्मर्षि भगवान् शंकर को जाकर वहाँ सहस्त्रों वर्षों तक चालू रहने वाले कृपा प्रसाद प्राप्त करने के लिये भूतल पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन करो। इन वेदोक्त विद्या के सारभूत साध्य-साधन का यज्ञपति भगवान् शिव की ही कृपा से ज्ञान होता है। ज्ञान का होना महसूस करने के लिए हमें अनुभव करने की आवश्यकता होती है। कई लोगों के पास अपने जीवन में ज्ञान बहुत होता है, परंतु अनुभवों की कमी के चलते वह जीवन में उस स्तर तक नहीं पहुंच पाते, जितना हमें उनके ज्ञान एवम विचारों से उनके बारे में पता चलता है।

शिव पद की प्राप्ति ही साध्य है यानी ज्ञान की साधन के योग्य बनाना। उनकी नित्य नैमित्तिक आदि फलों की ओर से सेवा ही साधन है तथा उनके प्रसाद से जो निस्पृह होता है, वही साधन है। लगातार शकुन से ज्ञान को महसूस करके जाननेवाला बनाना, ज्ञान को सेवा में इच्छा रहित, वासनारहित, निर्लोभ हो कर जीवन की साधना करना ही शिव की साधना है। वेदोक्त कर्म अनुष्ठान करके उसके महान् फल को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर देना ही परमेश्वर पद की प्राप्ति है।


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