सचेतन- 54 – आत्मबोध – ब्रह्म क्या है?- “जिसे पा लिया… उसके बाद कुछ भी बाकी नहीं”
एक सीधा सवाल हम पूरी ज़िंदगी क्या कर रहे हैं? कुछ पाने की दौड़… अच्छी नौकरी मिले… थोड़ा और पैसा… थोड़ी और पहचान… थोड़ा और सुख… और हर बार लगता है — बस यह मिल जाए… फिर सब ठीक हो जाएगा। पर क्या कभी “सब ठीक” हुआ? या हर बार कुछ नया चाहिए होता है? आज आत्मबोध का यह विचार कहता है — “जिसे पाने के बाद कुछ और पाने को न बचे, जिस सुख के बाद कोई और सुख न बचे, जिस ज्ञान के बाद कुछ जानने को न बचे — वही ब्रह्म है।” “जीवन की अंतिम प्राप्ति” क्या है? सोचिए… आपने एक लक्ष्य पाया — फिर अगला लक्ष्य। फिर अगला… यह सिलसिला खत्म होता है क्या? नहीं। क्योंकि हर प्राप्ति सीमित है। इसलिए शास्त्र कहता है — एक ऐसी प्राप्ति है जिसके बाद कुछ भी बाकी नहीं रहता। वही है ब्रह्म। बाहरी और भीतरी फर्क संसारी व्यक्ति: कुछ करता है ताकि उसे संतोष मिले। ज्ञानी व्यक्ति: पहले से संतुष्ट है, फिर भी करता है। यही सबसे बड़ा अंतर है। एक “संतोष पाने” के लिए जी रहा है। दूसरा “संतोष से” जी रहा है। असली सुख क्या है? हम सोचते हैं — नई चीज़ = नया सुख नई सफलता = नया सुख पर हर सुख का क्या होता है? आता है… और चला जाता है… इस...