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सचेतन 24 तैत्तिरीय उपनिषद् रथ रूपक

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“रथ रूपक” । यह आत्मा और शरीर के संबंध को बहुत सरल और प्रभावी तरीके से समझाता है। आत्मा क्या है? आत्मा हमारी असली पहचान है। यह अमर, शाश्वत और अविनाशी है। यह न दिखाई देती है, न ही छूई जा सकती है, लेकिन हर प्राणी में इसका अस्तित्व है। आत्मा ही वह चेतना है, जिससे शरीर चलता है। गीता कहती है – आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न जल सकती है, न काटी जा सकती है। आत्मा = विद्युत (करंट) जैसी है, जो बल्ब में दिखाई नहीं देती, पर बल्ब को जलाती है। ✨ शरीर क्या है? शरीर वह भौतिक ढांचा है, जिसमें आत्मा रहती है। यह पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। यह नश्वर है – जन्म लेता है, बढ़ता है, बूढ़ा होता है और अंत में नष्ट हो जाता है। शरीर आत्मा का अस्थायी घर या वाहन है। शरीर = बल्ब जैसा है, जो करंट (आत्मा) आने पर चमकता है और करंट (आत्मा) निकल जाने पर बुझ जाता है। आत्मा = असली “मैं” शरीर = अस्थायी “घर” जब तक आत्मा शरीर में है, शरीर जीवित है। जैसे ही आत्मा निकल जाती है, शरीर मृत हो जाता है। कठोपनिषद् का रथ रूपक उपनिषद् कहता है: शरीर = रथ शरीर उस रथ के समान है, जिसमें आत्मा यात्रा कर रह...

सचेतन- 23:तैत्तिरीय उपनिषद्: विज्ञानपुरुष ही “कर्त्ता” है

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विज्ञानमय कोश = वह आवरण/स्तर जिसमें बुद्धि (Intellect), विवेक (Discrimination), और निर्णय-शक्ति काम करते हैं। कर्त्ता अर्थात् वह जो कार्य करता है (doer/subject)। उदाहरण: राम फल खाता है । → यहाँ "राम" कर्त्ता है, क्योंकि खाने का काम वही कर रहा है। वाक्य का वह अंग जिससे यह ज्ञात होता है कि क्रिया किसके द्वारा की जा रही है , उसे कर्त्ता कहते हैं। उपनिषद इसे “कर्त्ता” (Doer / Decision-maker) कहता है, क्योंकि: निर्णय लेने की शक्ति – शरीर (अन्नमय) केवल साधन है, प्राण (ऊर्जा) केवल शक्ति है, मन केवल भावनाएँ और विचार है। लेकिन क्या करना है और क्या न करना है, इसका निर्णय बुद्धि लेती है। धर्म-अधर्म का विवेक –  मन कह सकता है “मुझे मिठाई खानी है”, लेकिन बुद्धि तय करती है – “यह मेरे स्वास्थ्य के लिए ठीक है या नहीं।” इस विवेक से कर्म की दिशा बनती है। कर्तृत्व का आधार – उपनिषद कहता है कि कर्म का असली जिम्मेदार बुद्धि है। क्योंकि शरीर, प्राण और मन तो उपकरण मात्र हैं, उन्हें दिशा बुद्धि ही देती है। इसलिए इसे “कर्त्ता” कहा गया। विज्ञानमय कोश का रूपक, “विज्ञानपुरुष” है तैत्तिरीयोपनि...

सचेतन- 22:तैत्तिरीय उपनिषद्: विज्ञानमय कोश

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मान लीजिए कोई बच्चा पूछे — “बुद्धि क्या होती है?” यदि हम कहें “निर्णय करने की शक्ति”, तो वह अमूर्त लगेगा। लेकिन यदि हम इसे “एक राजा” के रूपक में समझाएँ — जैसे राजा अपनी प्रजा को नियंत्रित करता है, वैसे ही बुद्धि हमारे मन, प्राण और शरीर को नियंत्रित करती है — तो बच्चा तुरंत समझ जाएगा। यही है पुरुष-रूपक – दार्शनिक सत्यों को “व्यक्ति-आकृति” का रूप देकर समझाना। पुरुष-रूपक उपनिषद् की एक शैली है जिसमें प्रत्येक कोश को पुरुष (मानव-आकृति) मानकर उसके सिर, अंग और हृदय बताए जाते हैं, ताकि अमूर्त सत्य को मूर्त और समझने योग्य रूप दिया जा सके। जैसे पहले कहा गया – अन्नमय कोश (शरीर) = एक आवरण है। प्राणमय कोश = शरीर में प्राण का आवरण। मनोमय कोश = विचार और भावना का आवरण। फिर आता है विज्ञानमय कोश – उपनिषद कहता है: यह धर्म-धारण करने वाली बुद्धि है। इसे कर्तृत्व का केंद्र कहा गया। यह “पुरुष” (आत्मा का प्रतीक) की तरह सबको धारण करता है। उदाहरण रूप में: जैसे राजा अपनी प्रजा को नियम और व्यवस्था से नियंत्रित करता है, वैसे ही विज्ञानमय कोश (विवेक-बुद्धि) शरीर, प्राण और मन – सबको दिशा देता है। यह “कर्त्...

सचेतन 21 तैत्तिरीय उपनिषद् पुरुष रूपक

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पुरुष के त्याग (बलिदान) से ही सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु और दिशाएँ उत्पन्न हुईं। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी उसी पुरुष से प्रकट हुए। अर्थात: हर कोश को ऐसे समझो, जैसे वह एक जीवित व्यक्ति हो, जिसके अंग-प्रत्यंग हों। 🌱 तैत्तिरीयोपनिषद् में प्रयोग    अन्नमय कोश (शरीर) इसे “अन्नपुरुष” कहा गया। सिर, हाथ, पैर, हृदय आदि का रूप देकर दिखाया गया कि शरीर भोजन से बना है। प्राणमय कोश (जीवन-शक्ति) इसे “प्राणपुरुष” कहा गया। इसमें प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – पाँच प्राण को अंग माना गया। मनोमय कोश (मन) इसे “मनःपुरुष” कहा गया। यहाँ विचार, भावना, संकल्प और इंद्रियों को अंग माना गया। विज्ञानमय कोश (विवेक-बुद्धि) इसे “विज्ञानपुरुष” कहा गया। इसमें श्रद्धा (आस्था), सत्य, धर्म और कर्तृत्व को अंग माना गया। आनन्दमय कोश (परमानन्द) इसे “आनन्दपुरुष” कहा गया। इसमें आनन्द, प्रेम, करुणा और शांति को अंग माना गया। मान लीजिए कोई बच्चा पूछे — “बुद्धि क्या होती है?” यदि हम कहें “निर्णय करने की शक्ति”, तो वह अमूर्त लगेगा। लेकिन यदि हम इसे “एक राजा” के रूपक में समझाएँ — जैसे राजा अप...