संदेश

विश्व ध्यान दिवस 2024: ध्यान की विधि और भगवद् गीता में इसके लाभ

चित्र
विश्व ध्यान दिवस हर साल 21 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिन आत्म-चिंतन, शांति और मानसिक स्थिरता के लिए ध्यान की प्राचीन प्रथाओं की महत्ता को समझाने और प्रचारित करने के लिए समर्पित है। ध्यान की विधि (Meditation Method): भगवद् गीता के अनुसार, ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने मन को स्थिर और शांत करे। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ध्यान का महत्व समझाते हुए कहते हैं: स्थान का चुनाव : एक स्वच्छ, शांत और पवित्र स्थान ध्यान के लिए उपयुक्त होता है। सही आसन : सुखासन या पद्मासन जैसे स्थिर और आरामदायक आसन अपनाएं। एकाग्रता : अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करें और बाहरी विकर्षणों से दूर रहें। समता का भाव : मन में किसी प्रकार की इच्छा या द्वेष को छोड़ दें। समय का चयन : सुबह और शाम का समय ध्यान के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। भगवद् गीता में ध्यान का महत्व (Benefits as per Bhagavad Gita): भगवद् गीता के छठे अध्याय (ध्याय योग) में भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यान के लाभ और इसे अपनाने के तरीकों को विस्तार से बताया है। आध्यात्मिक उन्नति : ध्यान व्यक्ति को आत्मा और परमात्मा के साथ जुड़ने का साधन प्...

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-38 : लोहे की तराजू और बनिए की कथा-2

चित्र
नमस्कार दोस्तों! स्वागत है आपका "सचेतन" के नए एपिसोड में। करटक ने दमनक को समझाते हुए कहा कि मूर्ख व्यक्ति अपनी कुबुद्धि और स्वार्थ के कारण अक्सर ऐसा कार्य कर बैठता है, जिससे दूसरों का नुकसान होता है और अंततः वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है। उसने जोर दिया कि किसी भी उपाय को अपनाने से पहले उसके खतरों और परिणामों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। अधूरी योजनाएँ और मूर्खता हमेशा विनाश का कारण बनती हैं। इसी संदर्भ में, करटक ने एक नई कथा सुनानी शुरू की— "लोहे की तराजू और बनिए की कथा"। इस कहानी में जीर्णधन नाम का एक बनिया था, जिसे व्यापार में घाटा होने के कारण अपना नगर छोड़कर विदेश जाने का निर्णय लेना पड़ा। उसने सोचा कि जिस स्थान पर उसने कभी अभिमान और सुखपूर्वक जीवन बिताया हो, वहाँ गरीबी में रहना उचित नहीं। देसावर जाने से पहले उसने अपनी पुश्तैनी लोहे की तराजू एक सेठ के पास सुरक्षित रख दी। जब वह वर्षों बाद लौटा और अपनी तराजू मांगी, तो सेठ ने झूठ बोल दिया कि चूहों ने तराजू खा ली। जीर्णधन ने शांति और चालाकी से इसका उत्तर दिया, और अपनी सूझ-बूझ से सेठ के झूठ को पकड़ने के लिए एक योजना बन...

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-37 : लोहे की तराजू और बनिए की कथा

चित्र
हमने धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा और बगला, सांप और केकड़े की कहानी सुना और यह जाना कि किस तरह बिना सोचे-समझे कोई उपाय करना विनाश को आमंत्रित कर सकता है।जिस स्थान पर छोटी-छोटी बातें अनदेखी की जाती हैं और मूर्खता या दुष्टता को बढ़ावा दिया जाता है, वहाँ बड़ी-बड़ी समस्याएँ स्वतः ही उत्पन्न हो जाती हैं।  करटक ने आगे कहा: मूर्ख व्यक्ति का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह बिना परिणाम सोचे अपने स्वार्थ और कुबुद्धि के कारण दूसरों का अहित कर बैठता है। जैसे पापबुद्धि ने सोचा था कि उसकी चालाकी काम आएगी, परंतु उसने अपने पिता की जान जोखिम में डाल दी और खुद भी नष्ट हो गया।इसलिए यह आवश्यक है कि किसी भी उपाय के साथ उसके विघ्नों (खतरों) पर भी ध्यान दिया जाए। मूर्खता और अधूरी योजना हमेशा विनाश का कारण बनती है। इस प्रकार करटक ने दमनक को समझाया कि बुद्धिमान व्यक्ति को हर कदम सोच-समझकर उठाना चाहिए। और उसने लोहे की तराजू और बनिए की कथा शुरू किया।  किसी नगर में जीर्णधन नाम का एक बनिया रहता था। व्यापार में घाटा होने के कारण उसके पास धन कम हो गया था। उसने देसावर (विदेश) जाकर नया काम करने की योजना बनाई।...

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-36 : बगला, सांप और केकड़े की कहानी

चित्र
सचेतन, पंचतंत्र की कथा-36 : बगला, सांप और केकड़े की कहानी नमस्कार दोस्तों! स्वागत है आपका "सचेतन" के नए एपिसोड में। पिछले एपिसोड में हमने धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कहानी सुनी, जिसमें हमने सीखा कि बिना सोचे-समझे उठाए गए कदम विनाशकारी हो सकते हैं। आज की कहानी भी एक ऐसी ही सीख देती है, जहां एक बगले ने अपनी मूर्खता से अपने पूरे परिवार का नाश कर लिया। एक जंगल में बगलों से भरा हुआ एक बड़ा बड़ का पेड़ था। उस पेड़ के खोखले में एक काला सांप रहता था, जो पेड़ पर रहने वाले बगलों के छोटे-छोटे बच्चों को खा जाता था। अपने बच्चों को खोने के दुःख से परेशान एक बगला तालाब के किनारे बैठकर आंसू बहा रहा था। यह देखकर एक केकड़ा उसके पास आया और बोला, "मामा! तुम क्यों रो रहे हो?" बगले ने जवाब दिया, "भाई, क्या करूं? पेड़ के खोखले में रहने वाला सांप मेरे बच्चों को खा गया है। अगर इसे मारने का कोई उपाय हो, तो मुझे बताओ।" केकड़ा सोचने लगा, "यह बगला तो हमारा स्वाभाविक शत्रु है। क्यों न इसे ऐसा उपाय बताऊं, जिससे न केवल सांप मरे, बल्कि इसका पूरा परिवार भी नष्ट हो जाए।" उसने बगले ...

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-35 : धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा-2

चित्र
आज हम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कहानी को आगे बढ़ाते हैं।"सचेतन" के विचार के सत्र में आपका स्वागत है! पहला भाग: किसी नगर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। एक दिन पापबुद्धि ने लालच में आकर धर्मबुद्धि को सुझाव दिया कि वे परदेश जाकर धन कमाएं। धर्मबुद्धि की ईमानदारी और मेहनत से दोनों ने परदेश में खूब धन कमाया। उन्होंने धन जंगल में गाड़ दिया। कुछ दिनों बाद पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि को बुलाया और गड्ढा खोदकर दिखाया कि धन गायब है। उसने धर्मबुद्धि पर चोरी का झूठा आरोप लगाया। धर्मबुद्धि शांतिपूर्वक बोला, "मैं धर्मबुद्धि हूं। मैं कभी चोरी नहीं कर सकता। धार्मिक व्यक्ति दूसरों की संपत्ति को मिट्टी समान और सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखता है।" दोनों के बीच विवाद बढ़ा, और वे न्याय मांगने के लिए राजदरबार गए। दूसरा भाग: दोनों इस विवाद को लेकर राजदरबार में पहुंचे अब आगे की कथा सुनेते हैं -  जब अदालत के अधिकारी धर्म और सत्य की जांच के लिए तैयार हुए, पापबुद्धि ने चालाकी से कहा, "यह मुकदमा शमी वृक्ष देवता के समक्ष सुलझाया जाए। वे हमारे बीच न्याय करेंगे।" ...

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-34 : धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा

चित्र
नमस्कार दोस्तों! आप सभी का "सचेतन" के इस नए एपिसोड में हार्दिक स्वागत है। पिछले एपिसोड में हमने "बंदर और गौरैया" की कहानी सुनी, जिसमें यह संदेश दिया गया था कि दूसरों को कष्ट देकर खुशी पाने की कोशिश करने वाला व्यक्ति अपने विनाश की ओर अग्रसर होता है। इसके साथ ही हमने शास्त्रों में वर्णित संतानों के चार प्रकार—जात, अनुजात, अतिजात, और अपजात के बारे में चर्चा की थी। पंचतंत्र की ये कहानियाँ न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि जीवन के गूढ़ सिद्धांतों को सरलता से समझाने का माध्यम भी हैं। आज हम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं, जो हमें यह सिखाती है कि ईमानदारी और विवेक का रास्ता हमेशा सही होता है। किसी नगर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। पापबुद्धि स्वभाव से चालाक और स्वार्थी था, जबकि धर्मबुद्धि सच्चा और बुद्धिमान था। एक दिन पापबुद्धि ने सोचा, "मैं गरीब और मूर्ख हूँ। क्यों न धर्मबुद्धि को साथ लेकर परदेश जाऊं, उसकी मदद से धन कमाऊं और फिर उसे धोखा देकर सारा धन हड़प लूं।" उसने धर्मबुद्धि से कहा, "मित्र, क्या तूने कभी ...