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प्रार्थना और परिश्रम का महत्व

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जहाँ हम जीवन की गहराइयों में उतरकर, रोज़मर्रा की समस्याओं का समाधान ढूंढ़ते हैं। हम चर्चा कर रहे हैं प्रार्थना और परिश्रम के महत्व पर।  प्रार्थना का भाव आपके जीवन में सतत, दिन रात बना रहना चाहिए। प्रार्थना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह आपकी आत्मा का संवाद है, आपके अंदर की गहराई से निकलता हुआ। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए, जो आपको हर परिस्थिति में साहस और शांति प्रदान करे। परिश्रम के लिए बुद्धि, बल, प्रक्रम, और रणनीति बना कर रखना चाहिए जिससे आपको हर जगह विजय मिल सके। परिश्रम केवल शारीरिक मेहनत नहीं है, इसमें आपकी सोच, आपकी योजना, और आपकी रणनीति का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। जब आप अपनी बुद्धि का सही उपयोग करते हैं, अपनी ताकत को सही दिशा में लगाते हैं, और एक सुव्यवस्थित रणनीति बनाते हैं, तभी आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। सफलता का राज़ यही है कि आप प्रार्थना और परिश्रम, दोनों को अपने जीवन में संतुलित रूप से अपनाएँ। प्रार्थना आपको आंतरिक शक्ति और धैर्य देती है, जबकि परिश्रम आपको बाहरी सफलता दिलाता है। दोनों का समन्वय आपको हर चुनौती का सामना करने और हर...

सचेतन 2.85 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका) का विध्वंस

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शास्त्रों में शत्रु के शक्ति को जानने के लिए चार उपाय बताये हैं—साम, दान, भेद और दण्ड। स्वागत है आपका हमारे इस विशेष सचेतन के सत्र में, जहां हम आपको सुनाएंगे हनुमान जी के प्रमदावन विध्वंस की अद्भुत कथा। आइए, इस रोमांचक यात्रा पर चलें। बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।। अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता ।। हनुमान् जी ने बार-बार सीता जी के चरणो मे सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता ! अब मै कृतार्थ हो गया । आपका आशीर्वाद अमोघ ( अचूक ) है , यह बात प्रसिद्ध है ।। सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।। सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ।। 4 ।। हे माता ! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षो को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है । ( सीता जी ने कहा- ) हे बेटा ! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते है ।।  तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ।। 5 ।। ( हनुमान् जी ने कहा – ) हे माता ! यदि आप मन मे सुख माने ( प्रसन्न होकर ) आज्ञा दे तो मुझे उसका भय तो बिलकुल नही है ।। देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।...

सचेतन 2.84: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी ने सीता माता को आश्वस्त करने का निश्चय किया।

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सचेतन में हम हनुमान जी की यात्रा और उनका सीता माता को आश्वासन देने का अद्भुत प्रसंग की अनुभूति कर रहे हैं। समुद्र-तरण के विषय में शंकित हुई सीता जी को वानरों का पराक्रम बताकर हनुमान जी ने उन्हें कैसे आश्वस्त किया, यह सुनिए-  सीताजी : "मणि देने के पश्चात् सीता हनुमान जी से बोलीं, 'मेरे इस चिह्न को भगवान् श्रीरामचन्द्रजी भलीभाँति पहचानते हैं। इस मणि को देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियों का—मेरी माता का, मेरा तथा महाराज दशरथ का एक साथ ही स्मरण करेंगे। कहती हैं हे हनुमान! कपिश्रेष्ठ! तुम पुनः विशेष उत्साह से प्रेरित हो इस कार्य की सिद्धि के लिए जो भावी कर्तव्य हो, उसे सोचो। वानरशिरोमणे! इस कार्य को निभाने में तुम्ही प्रमाण हो—तुम पर ही सारा भार है। तुम इसके लिए कोई ऐसा उपाय सोचो, जो मेरे दुःख का निवारण करने वाला हो। हनुमान जी ने सीता माता को आश्वस्त करने का निश्चय किया। सीता माता कहती हैं हनुमान! तुम विशेष प्रयत्न करके मेरा दुःख दूर करने में सहायक बनो।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर सीताजी की आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके वे भयंकर पराक्रमी पवनकुमार विदेहन...

सचेतन 2.83: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सीता जी ने दिव्य चूड़ामणि श्री रामचन्द्र जी को दिया

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कल के प्रसंग में एक साधारण अपराध karne  वाले इंद्र के पुत्र जयंत नामक के कौवे पर श्रीराम जी ने ब्रह्मास्त्र चलाया था और फिर जो सीता जी को हर कर लाया उसको वो  कैसे क्षमा कर रहे हैं? तक चर्चा किए थे।  यहाँ तक था की  सीता जी भगवान राम के बारे में कहती हैं की - "पवनकुमार! नाग, गन्धर्व, देवता और मरुद्गण — कोई भी समरांगण में श्रीरामचन्द्रजी का वेग नहीं सह सकते हैं, फिर भी वे मुझ पर कृपा दृष्टि नहीं कर रहे हैं।  सीता संवेदना के साथ कहती है कि "वे दोनों पुरुष सिंह, वायु तथा इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। यदि वे देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं तो किस के लिये मेरी उपेक्षा करते हैं? निःसंदेह मेरा ही कोई महान पाप उदित हुआ है, जिससे वे दोनों शत्रुसंतापी वीर मेरा उद्धार करने में समर्थ होते हुए भी मुझ पर कृपादृष्टि नहीं कर रहे हैं।" विदेह कुमारी सीता ने आँसू बहाते हुए जब यह करुणायुक्त बात कही, तब इसे सुनकर वानर यूथपति महातेजस्वी हनुमान गहरी सांस की ध्वनि लेते हुए इस प्रकार बोले..  अब आप भगवान् श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, तेजस्वी सुग्रीव तथा वहाँ एकत्र हुए वानरों को संदेश स्वरूप उ...

सचेतन 2.82: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - इंद्र के पुत्र जयंत नामक के कौवे पर श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र चलाया

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पिछले विचार के सत्र में एक मांसलोलुप कौआ सीता जी को चोंच मारने लगा और सीता जी उस पक्षी पर बहुत कुपित होकर दृढ़तापूर्वक अपने लहँगे को कसने के लिये कटिसूत्र (नारे)को खींचने लगी तो उस समय उनक वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्था में श्री राम ने उनको देख लिया।अब आगे-  सीता जी कहती हैं कि कौवों चहचहाहट करता हुआ बार बार मुझे परेशान करने लगा यह देखकर आपने (श्री राम ने) मेरी हँसी उड़ायी। इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी। इतने में ही उस भक्ष्य-लोलुप कौएने फिर चोंच मारकर मुझे क्षत-विक्षत कर दिया और उसी अवस्था में मैं आपके पास आयी। आप वहाँ बैठे हुए थे। मैं उस कौए की हरकत से तंग आ गयी थी। अतः थककर आपकी गोद में आ बैठी। उस समय मैं कुपित-सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी। सीता जी ने हनुमान जी को मृदु वाणी में कहा "'नाथ! कौए ने मुझे कुपित कर दिया था। मेरे मुखपर आँसुओं की धारा बह रही थी और मैं धीरे-धीरे आँखें पोंछ रही थी। आपने मेरी उस अवस्था को लक्ष्य किया। क्या कहूँ 'हनुमान्! मैं तो थक जाने के कारण उस दिन बहुत देर तक श्रीरघुनाथजी की गोद में सोयी रही। फिर...

सचेतन 2.81: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सीता जी को कौआ ने चोंच मारा

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सचेतन में आज हम सभी सुन्दरकाण्ड के इस कहानी के इस अद्भुत पथ पर हैं जहां, हनुमानजी  ने अपनी कौशल भरी चालाकी और नेतृत्व का परिचय दिया। अब, चलिए, सुनिए उनकी इस अद्भुत कहानी को। सीताजी का हनुमान जी को पहचान के रूप में चित्रकट पर्वत पर घटित हुए एक कौए के प्रसंग को सुनाती है। और श्रीराम को शीघ्र बुलाने के लिए अनुरोध करती है और अपनी चूड़ामणि देती है।  कहानी की बात सुनकर सीता जी के इस वचन से कपिश्रेष्ठ हनुमान जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बातचीत में कुशल थे। उन्होंने पूर्वोक्त बातें सुनकर सीताजी  से कहा— ‘देवि! आपका कहना बिलकुल ठीक और युक्तिसंगत है। शुभदर्शने! आपकी यह बात नारी स्वभाव के तथा पतिव्रताओं की विनयशीलता के अनुरूप है॥ ‘इसमें संदेह नहीं कि आप अबला होने के कारण मेरी पीठ पर बैठकर सौ योजन विस्तृत समुद्र के पार जाने में समर्थ नहीं हैं॥ ‘जनकनन्दिनि! आपने जो दूसरा कारण बताते हुए कहा है कि मेरे लिये श्रीरामचन्द्रजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष का स्वेच्छापूर्वक स्पर्श करना उचित नहीं है, यह आपके ही योग्य है। देवि! महात्मा श्रीराम की धर्मपत्नी के मुख से ऐसी बात निकल सकती है। आपको छोड़...

सचेतन 2.80: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी की आत्मकथा

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अपने मन में चल रहे विचारों से भय और चिंताओं का सामना करना। कपिवर हनुमान जी ने सीता जी से कहा "आपको पीठ पर बैठाकर मैं समुद्र को लाँघ जाऊँगा।देवि! विदेहनन्दिनि! आप मेरे साथ चलकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी का शोक दूर कीजिये’’।  सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।  तब ( उसे देखकर ) सीता जी  के मन मे विश्र्वास हुआ । हनुमान् जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया।  सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल। हे माता ! सुनो , वानरो मे बहुत बल-बुद्धि नही होती, परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरूड़ को खा सकता है ( अत्यंत निर्बल भी महान् बलवान् को मार सकता है ) सीता जी कहती है की "कपिश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरा जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है; क्योंकि तुम्हारा वेग वायु के वेग के समान तीव्र है। जाते समय यह वेग मुझे मूर्च्छित कर सकता है।मैं समुद्र के ऊपर-ऊपर आकाश में पहुँच जाने पर अधिक वेग से चलते हुए तुम्हारे पृष्ठभाग से नीचे गिर सकती हूँ। इस तरह समुद्र में, जो तिमि नामक बड़े-बड़े मत्स्यों, नाकों और मछलियों से भरा हुआ है, ग...

सचेतन 2.79: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सीता जी को हनुमान ने अपनी पीठ पर बैठने का आग्रह किया।

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सीता जी हनुमान जी पर वानरोचित चपलता होने का संदेह किया  हनुमान जी ने सीता जी से कहा की मैं अभी आपको इस राक्षसजनित दुःख से छुटकारा दिला दूंगा। सती-साध्वी देवि! आप मेरी पीठ पर बैठ जाइये।  कपिवर हनुमान जी ने सीता जी से कहा "आपको पीठ पर बैठाकर मैं समुद्र को लाँघ जाऊँगा। मुझ में रावणसहित सारी लंका को भी ढो ले जाने की शक्ति है। ‘मिथिलेश कुमार! रघुनाथ जी प्रस्रवण गिरि पर रहते हैं। मैं आज ही आपको उनके पास पहुँचा दूंगा ठीक उसी तरह, जैसे अग्निदेव हवन किये गये हविष्य को इन्द्र की सेवा में ले जाते हैं।  विदेहनन्दिनि! दैत्यों के वध के लिये उत्साह रखने वाले भगवान् विष्णु की भाँति राक्षसों के संहार के लिये सचेष्ट हुए श्रीराम और लक्ष्मण का आप आज ही दर्शन करेंगी॥ आपके दर्शन का उत्साह मन में लिये महाबली श्री राम पर्वत-शिखर पर अपने आश्रम में उसी प्रकार बैठे हैं, जैसे देवराज इन्द्र गजराज ऐरावत की पीठ पर विराजमान होते हैं। "देवि! आप मेरी पीठ पर बैठिये। शोभने! मेरे कथन की उपेक्षा न कीजिये। चन्द्रमा से मिलने वाली रोहिणी की भाँति आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ मिलने का निश्चय कीजिये।  मुझे भगवान...

सचेतन 2.77: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - प्रेम और समर्पण

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श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे? जितने ही प्राचीन कथाओं के गहराई में आप जाते हैं उतने ही भक्ति और समर्पण की कहानी हमारे दिलों को छू जाती है। आज की कथा है हनुमान जी की, जो अपनी प्रिय सीता माता को उद्धार करने के लिए प्रेरित हुए रामचंद्र जी के दूत बन कर अशोक वाटिका में उपस्थित हैं। हनुमान जी ने लंका में दी माता सीता को मुद्रिका दी, लेकिन माता सीता की आँखों में एक उत्सुकता बसी थी। वे पूछती हैं, "श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे?" हनुमान जी ने अपने माधुर्य से कहा, "श्रीराम ने न केवल मित्रों का संग्रह किया है, बल्कि उन्होंने अपने शत्रुओं को भी शरण दी है। वे न केवल मित्रों का उपकार किया हैं, बल्कि उन्होंने अपने भक्तों को भी प्राप्त किया है।" हनुमान जी ने और भी कहा, "रामचंद्र जी सदा सुख-भोगने योग्य हैं, दुःख-भोगने के योग्य कभी नहीं होते, लेकिन उनके दुःख और पीड़ा बढ़ी है।" हनुमान जी ने अपने सान्त्वना भरे शब्दों में कहा, "माता सीता, श्रीरामचंद्र जीआपको जरूर छुड़ाएंगे, और भरत जी, सुग्रीव और लक्ष्मण जैसे वीर प्राणियों के सहारे, आपको यहाँ से ले जाएँगे।  हनुमान जी का यह...

सचेतन 2.76: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमानजी का प्रेम संदेश: सीता को आश्वासन

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हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का ‘श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे’ यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमान् का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना नमस्ते और स्वागत है आपका, प्रिय श्रोताओं, हमारे इस सचेतन के विचार के सत्र में "हनुमान् का प्रेम संदेश: सीता को आश्वासन"। आज हम एक दिलचस्प कहानी का संवाद करेंगे, जो हमें भक्ति और प्रेम के महत्वपूर्ण सन्देश से अवगत कराएगी। हनुमान जी का सीता को मुद्रिका देना, उसकी विश्वासपूर्ण भविष्यवाणी को पूरा करने का प्रयास था। उन्होंने सीता को मुद्रिका के साथ कहा, "महाभागे! मैं परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम का दूत वानर हूँ।" संवेदनशीलता भरे उत्साहपूर्ण भाव सीता, उत्सुकता से होकर पूछती है, "श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे?" और हनुमान् उन्हें धैर्य दिलाते हुए कहते हैं, "आपका कल्याण हो। अब आप धैर्य धारण करें।" आनंद और संतोष की विभिन्न अभिव्यक्ति सीता, पति के हाथ में सुशोभित मुद्रिका को लेकर ध्यान से देखती हैं। उस समय, जब उन्हें मुद्रिका की दृश्यता होती है, तो वे इतनी प्रसन्न होती हैं, मानो स्वयं...