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सचेतन 219: शिवपुराण- वायवीय संहिता - संचित और प्रारब्ध कर्म

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कर्म एक सीमित संभावना है और यही आपको एक सीमित इंसान बनाता है। हमने बात किया था की कला का सीधा संबंध हमारे कर्म से है और कर्म का अर्थ होता है 'क्रिया'। अगर आप कर्म को सोचेंगे तो आपको लगेगा की जो कुछ कर्म मनुष्य करता है उससे कोई फल उत्पन्न होता है और यह फल शुभ, अशुभ अथवा दोनों से भिन्न हो सकता है।  सामान्यतः  कर्म फल का नियम मन:प्रेरित क्रियाओं में ही लागू होता है जैसे कभी कभी हम जान बूझकर किसी को दान देना अथवा किसी का वध करना ही सार्थक समझते है। हमने एक प्रश्न किया था की जब अनजाने में किसी का उपकार कर देना अथवा किसी को हानि पहुँचाना क्या कर्म की उक्तपरिधि यानी मन:प्रेरित क्रियाओं में नहीं आता?  “कर्म” एक ऐसी सक्रिय शक्ति के लिए प्रयोग की जाने वाली अभिव्यक्ति है जो यह दर्शाती है कि भविष्य में होने वाली घटनाओं को नियंत्रित करना आपके अपने हाथ में है। - 14वें दलाई लामा  कर्म को समझने की दृष्टि से धूम्रपान एक अच्छा उदाहरण है, क्योंकि जब भी हम एक सिगरेट पीते हैं तो उसमें ही अगली एक और सिगरेट पीने की सम्भावना निहित होती है। हम जितना ज्यादा धूम्रपान करते हैं, धूम्रपान करने की...

सचेतन 218: शिवपुराण- वायवीय संहिता - कर्म मन:प्रेरित क्रिया होती है।

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कर्म आपकी भावना पर आधारित होता है जिसका स्वतः फल मिलता है। हमारी सर्वव्यापी चेतन ही हमारी प्रकृति है या कहें की यह महेश्वर की शक्ति यानी  माया है जो आपको आवृत करके रखती है। और यही आवरण कला है। जब हम कला कहते हैं तो यह कला न की ज्ञान हैं, न शिल्प हैं, न ही विद्या हैं, बल्कि कला के द्वारा हमारी आत्म परमानन्द का अनुभव होता है। प्रायः हमारे कर्म के कारण यह आवरण रूपी कला हमको अपने ही विराट और विश्व रूप से मिलता है या दूर ले जाता है, जिसपर हमारे आत्म के परमानन्द का अनुभव निर्भर करती हैं।  कला हमारे मन में बनी स्‍वार्थ, परिवार, क्षेत्र, धर्म, भाषा और जाति आदि की सीमाएँ मिटाकर विस्‍तृत और व्‍यापकता प्रदान करती है। व्‍यक्ति के मन को उदार बनाती है। वह व्‍यक्ति को “स्‍व” से निकालकर “वसुधैव कुटुम्‍बकम्” से जोड़ती है। कला जीवन के ऊर्जा का महासागर है जिसमें हमारी अंतश्‍चेतना को जाग्रत करती है और ऊर्जावान जीवन को उभारती है।  कला का सीधा संबंध हमारे कर्म से है। कर्म का अर्थ होता है 'क्रिया'। व्याकरण में क्रिया से निष्पाद्यमान फल के आश्रय को कर्म कहते हैं। "राम घर जाता है' इस उदाहरण मे...

सचेतन 217: शिवपुराण- वायवीय संहिता - कला से मनोवृत्तियों में रुपान्‍तरण होता है

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कला के द्वारा हमारी आत्म को परमानन्द का अनुभव होता है। कल हमने भगवान विष्णु तथा कृष्ण की प्रचलित कथा भगवद्गीता को ध्यान करते हुए विश्वरूप दर्शन का ज़िक्र किया था वैसे तो ईश्वर के अनेक अलौकिक रूप, आकृति तथा रंग हैं, सिर्फ़ प्रश्न यह है की हम कैसा रूप देखना चाहते हैं और याद रखें की सभी रूप हमारे शुभ-अशुभ विचारों और कर्मों से पोषित होता है।  यह विचार और कर्म ही हमारी माया है और इन दोनों के प्रेरक ईश्वर शिव हैं। माया यानी आपकी प्रकृति महेश्वर की शक्ति है। ज़रूरत है चित्स्वरूप प्रकृति यानी इस महेश्वर की शक्ति की माया को शुद्धता से आच्छादित करने की और आप अनुभव करेंगे की आपका  जीव स्वत: शिव होता जाएगा। यह विशुद्धता का भाव ही शिवत्व है। हमारी सर्वव्यापी चेतन को आपकी प्रकृति है या कहें की यह महेश्वर की शक्ति यानी  माया जो आपको आवृत करती है। और यही आवरण कला है। जब हम कला कहते हैं तो इसका तात्पर्य है की रेखा, आकृति, रंग, ताल तथा शब्द, जैसे-- रेखाचित्र, रंजनकला, मूर्तिकला, नृत्य, संगीत, कविता एवं साहित्य लेकिन कला के इस रूप में मानव की प्रवृत्तियों का बाहारी अभिव्यक्ति हैं। सच तो यह ...

सचेतन 216: शिवपुराण- वायवीय संहिता - हम सभी विराट रूप से आवृत हैं

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जीव स्वत: शिव हो जाता है जब वह विशुद्ध शिवत्व को समझता है हमने सचेतन में बातचीत किया था की आपके अपने शरीर में उपस्थित मन, बुद्धि, अहंकार और माया शक्ति यानी प्राकृति से व्यक्तित्त्व निर्मित होता है। आपके व्यक्तित्त्व आपकी सोच से आपके इस शरीर का रूप बहुत व्यापक यानी फैला हुआ और अत्यंत विशाल भी है। आपने विराट रूप भगवान विष्णु तथा कृष्ण का सार्वभौमिक स्वरूप की प्रचलित कथा भगवद्गीता के अध्याय ११ को सुना होगा और उसको ध्यान भी करें, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को कुरुक्षेत्र युद्ध में विश्वरूप दर्शन कराते हैं। यह युद्ध कौरवों तथा पाण्डवों के बीच राज्य को लेकर हुआ था। परंतु विश्वरूप दर्शन राजा बलि आदि ने भी किया है। भगवान श्री कृष्ण नें गीता में कहा है-- पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।। अर्थात् हे पार्थ! अब तुम मेरे अनेक अलौकिक रूपों को देखो। मैं तुम्हें अनेक प्रकार की आकृतियों वाले रंगो को दिखाता हूँ। विश्वरूप अर्थात् विश्व (संसार) और रूप। यह रूप इतना विराट है की भगवान संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन एक पल में करा देते हैं। जिसमें ऐसी वस्तुऐं होती हैं ...

सचेतन 215: शिवपुराण- वायवीय संहिता - शरीर शुभ-अशुभ विचारों और कर्मों से पोषित हो कर भाग्य का निर्माण करता है।

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आत्म साक्षात्कार से कर्मबंधन सर्वथा मुक्त हो सकते है  क्षर का अर्थ होता है जिसका क्षरण होता हो जो नाशवान् या नष्ट होने वाला है जैसे हमारा शरीर क्षर है जो यहाँ का यहीं रहा जाता है लेकिन इस शरीर के बिना हमारे अस्तित्व की उत्पत्ति का बोध होना मुश्किल है। हम अपने शरीर से बंधे हुए हैं यह जड (प्रकृति ) है।  दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है।अक्षर शब्द का अर्थ है - 'जो न घट सके, न नष्ट हो सके' जैसे हमारी 'वाणी' या 'वाक्‌' और यह चेतना यानी हमारा जीवंत रूप, यह हमारी मायाशक्ति है। क्षर और अक्षर पुरुष मिलकर भगवान् स्वयं अपने रूप में आते हैं। हमारा शरीर और जीवात्मा दोनों इस प्रकृति का कूटस्थ है। कूटस्थ का अर्थ है कूट का अधिष्ठान अथवा आधार। कूट यानी माया है जिसको हम वञ्चना, छल, कुटिलता आदि पर्याय देते हैं और कूटस्थ, भारतीय दर्शन में आत्मा, पुरुष, ब्रह्म तथा ईश्वर के लिए प्रयुक्त शब्द है जिसका निवास इसी क्षर शरीर में है।  जब से हमने होंश संभाला है तब क्षर और अक्षर यानी शरीर और जीवात्मा में ईश्वर के निवास का ज्ञान तो सिर्फ़ हम सुन कर रहे हैं। अभी तक ईश्वर का हमारे शरीर और जीवात...

सचेतन 214: शिवपुराण- वायवीय संहिता - क्षर और अक्षर पुरुष दोनों भगवान् स्वयं ही हैं।

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क्षर, अक्षर तथा अतीत तीन तत्त्व के बारे में जानकारी  किसी भी वस्तु के तीन भेद बताये हैं- जड (प्रकृति ), चेतन (जीव) और उन दोनों का नियन्ता (परमेश्वर)। इन्हीं तीनों को क्रम से पाश, पशु तथा पशुपति कहते हैं। तत्त्वज्ञ पुरुष प्राय: इन्हीं तीन तत्त्व को क्षर, अक्षर तथा उन दोनों से अतीत कहते हैं।  क्षर का अर्थ होता है जिसका क्षरण होता हो जो नाशवान् या नष्ट होने वाला है जैसे हम कहते हैं की क्षर देह यहाँ का यहीं रहा जाता है। क्षर तत्त्व का ही नाम पाश है। क्षर पुरुष की उत्पत्ति का बीज है। यानी यह शरीर के बिना हमारे अस्तित्व की उत्पत्ति का बोध होना मुश्किल है। हम अपने शरीर से बंधे हुए हैं यह जड (प्रकृति ) है।  दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है।अक्षर शब्द का अर्थ है - 'जो न घट सके, न नष्ट हो सके'। इसका प्रयोग हमलोग ज़्यादातर 'वाणी' या 'वाक्‌' के लिए एवं शब्दांश के लिए करते हैं जो चेतना (जीव) है। अक्षर भगवान की मायाशक्ति है।अनेक संसारी जीवों की कामना और कर्म आदि के संस्कारों का आश्रय हमारे शरीर ही है। अक्षर ही पशु कहा गया है। क्षर और अक्षर पुरुष दोनों भगवान् स्वयं ही हैं। वह ...

सचेतन 212: शिवपुराण- वायवीय संहिता - हमारी आध्यात्मिक यात्रा

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जीवन में वास्तविकता और आपके चेतना के बीच संतुलन आपको 'पशुपति' बना देता है। सचेतन तो हमारी यात्रा है- पशु से परमात्मा बनने तक। हम वानर (बंदर) थे। हम नर बन गये हैं । हमें नारायण (सभी पशु और मानव विशेषताओं का स्वामी, जो इन दोनों से परे है) बनना है। यह हमारी आध्यात्मिक यात्रा है.  उदाहरण के लिए, छाया प्रकाश के बिना मौजूद नहीं हो सकती। अवलोकन की कसौटी के आधार पर, दोनों प्रमुख पहलुओं में से कोई भी किसी विशेष वस्तु में अधिक मजबूती से प्रकट हो सकता है। यिन और यांग प्रतीक (या ताईजितु) प्रत्येक अनुभाग में विपरीत तत्व के एक हिस्से के साथ दो विपरीत तत्वों के बीच संतुलन दिखाता है।  संतुलन हमारे वास्तविकता यानी यथार्थ या कहें की आपकी मूलभुत-मौलिक प्रकृति, अस्तित्व, अस्मिता, परिवर्तन, समय, कार्य-कारणता, अनिवार्यता तथा संभावना और आपके चेतना की प्रकृति और मन और गुण के बीच, और आपकी क्षमता और वास्तविक संभावना के बीच संबंध के बारे में अपने आपको 'पशुपति' के रूप में शामिल करना पड़ता है।  भारत में हम इन दो पहलुओं को पुरुष और प्रकृति कहते हैं। शिव और शक्ति, देवता और असुर, देवताओं और असुरों का ...

सचेतन 211: शिवपुराण- वायवीय संहिता - परमात्मा और पशु या यिन और यांग जिसे ब्रह्माण्ड की दो शक्तियों के रूप में माना गया है।

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जीवन में वास्तविकता और आपके चेतना के बीच का संतुलन 'पशुपति' बना देता है। मानव पशु से भिन्न है क्योंकि हम सचेत प्राणी हैं और स्वयं को नियंत्रित कर सकते हैं। जानवरों में भी चेतना होती है, लेकिन उनकी चेतना हमारी तरह विकसित नहीं है।  हमारा मानस उन सभी आदिम प्रवृत्तियों का भंडार है जो हमने विकास की प्रक्रिया के दौरान अर्जित की थीं। ये वृत्तियाँ और प्रवृत्तियाँ वेशक हमें जानवर बनाती हैं लेकिन एक बार जब हम मानव बन जाते हैं, तो हम पूरी तरह से अपने पशु स्वभाव से आगे निकल सकते हैं और दिव्य चेतना प्राप्त कर सकते हैं। भगवान पशुपति इसी का प्रतीक हैं।  'पशुपति' का अर्थ है 'पशु का भगवान'। कोई व्यक्ति जो अपने पशुवत स्वभाव को पार कर चुका है, कोई जो अब किसी पाश के भीतर नहीं है, कोई जो पशु स्वभाव के हर रूप से मुक्त है, उसे पशुपति कहा जा सकता है। भगवान शिव इस अतिक्रमण के प्रतीक हैं। इसीलिए, उन्हें पशुपति कहा जाता है।  क्या चीज़ हमें जानवर बनाती है? हमारी भूख और यह भूख आपके शब्द में भी है और आपके रूप में भी है। आपकी इच्छाएँ, भय, अतीत की आदिम छापें - ये वो चीज़ें हैं जो हमें जानवर बन...

सचेतन 210: शिवपुराण- वायवीय संहिता - हम में से प्रत्येक का एक पशु पक्ष है।

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मनमन्थ सत्य से भी परम सत्य एवं शुभ है जिससे आप परमानन्द को प्राप्त कर सकते हैं मुनियों ने वायु देवता से पूछा-आपने वह कौन सा मनमन्थ प्राप्त किया, जो सत्य से भी परम सत्य एवं शुभ है तथा जिसमें उत्तम निष्ठा रखकर पुरुष परमानन्द को प्राप्त करता है? वायु देवता बोले-महर्षियो ! पूर्वकाल में पशु-पाश और पशुपति का जो ज्ञान प्राप्त किया था, सुख चाहने वाले पुरुष को उसी में ऊँची निष्ठा रखनी चाहिये। अज्ञान से उत्पन्न होनेवाला दुख ज्ञान से ही दूर होता है। वस्तु के विवेक का नाम ज्ञान है। इंसान हर जीव की मिली जुली अभिव्यक्ति है। ऋग्वेद में मनुष्य के अतिरिक्त पशुओं का तीन प्रकार से विभाजन किया गया है हवा में विचरने वाला (वायव्य), जंगल में रहने वाला (अरण्य), और गाँव में रहने वाला (ग्राम्य), या पालतू जानवर। वैसे तो 'पशु' का अर्थ है 'पशु' यानी जानवर होता है। यह संस्कृत शब्द 'पाश' (जंजीर या हथकड़ी) से आया है।  जब हम पाश यानी बंधन के बारे में सोचते हैं तो यह ऐसी चीजें हैं जो हमें कुछ खास तरीकों से व्यवहार करने के लिए बाध्य करती हैं यह हमारा संस्कार (प्रवृत्ति), कामना या वासना (इच्छाएं),...

सचेतन 209: शिवपुराण- वायवीय संहिता - कुमारावस्था अति मनोरम और दिव्य होता है।

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हम सबके पालक पिता महेश्वर शिव के रूप में प्रवेश करते हैं तो हमारी सोच हमारा मन और हमारा वचन सब कुछ उतम ज्ञान पाने के लिए तत्पर रहता है। कल हमने बात किया था की हम सभी के जीवन के प्रथम वर्ष से ही देवाधिदेव महेश्वर के दर्शन का इंतज़ार होना प्रारंभ हो जाता है। सूत जी अपनी कथा में कहते हैं की वायु देवता दिव्य कुमारावस्था से युक्त रूप धारण करके रूपवानो में श्रेष्ठ श्वेत नामक मुनि होकर दिव्य वाणी बोलते हुए उनके सामने उपस्थित हुए। जब हमारा प्राण वायु प्रारंभ होता है तो सबसे पहले ध्वनि स्वरूप हम रोते हैं और बाल्य उम्र में हमारी किलकारी सभी को लुभाती है और फिर धीरे  धीरे कुमारावस्था आते आते हमारे रूप और कांति बढ़ती जाती है एक प्रेममय से युक्त रूप हम धारण करते हैं। हमारी आभा और श्रेष्ठ उज्जवल रूप जिसे शास्त्र में श्रेष्ठ श्वेत नामक मुनि की संज्ञा दी है वह हमारे शरीर में प्रकट होते हैं। हमारी हर एक बातें कुमारावस्था अति मनोरम और दिव्य वाणी की तरह होती है।  कहते हैं की वेदों के अधिपति तथा सबके पालक पिता महेश्वर का दर्शन करके गायत्री सहित ब्रह्माजी कुमारावस्था में आपको प्रणाम किया करते हैं। ...