सचेतन 219: शिवपुराण- वायवीय संहिता - संचित और प्रारब्ध कर्म
कर्म एक सीमित संभावना है और यही आपको एक सीमित इंसान बनाता है। हमने बात किया था की कला का सीधा संबंध हमारे कर्म से है और कर्म का अर्थ होता है 'क्रिया'। अगर आप कर्म को सोचेंगे तो आपको लगेगा की जो कुछ कर्म मनुष्य करता है उससे कोई फल उत्पन्न होता है और यह फल शुभ, अशुभ अथवा दोनों से भिन्न हो सकता है। सामान्यतः कर्म फल का नियम मन:प्रेरित क्रियाओं में ही लागू होता है जैसे कभी कभी हम जान बूझकर किसी को दान देना अथवा किसी का वध करना ही सार्थक समझते है। हमने एक प्रश्न किया था की जब अनजाने में किसी का उपकार कर देना अथवा किसी को हानि पहुँचाना क्या कर्म की उक्तपरिधि यानी मन:प्रेरित क्रियाओं में नहीं आता? “कर्म” एक ऐसी सक्रिय शक्ति के लिए प्रयोग की जाने वाली अभिव्यक्ति है जो यह दर्शाती है कि भविष्य में होने वाली घटनाओं को नियंत्रित करना आपके अपने हाथ में है। - 14वें दलाई लामा कर्म को समझने की दृष्टि से धूम्रपान एक अच्छा उदाहरण है, क्योंकि जब भी हम एक सिगरेट पीते हैं तो उसमें ही अगली एक और सिगरेट पीने की सम्भावना निहित होती है। हम जितना ज्यादा धूम्रपान करते हैं, धूम्रपान करने की...