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सचेतन :72 श्री शिव पुराण- सगुण और निर्गुण भक्ति धारा

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सचेतन :72 श्री शिव पुराण- सगुण और निर्गुण भक्ति धारा  #RudraSamhita   https://sachetan.org/ शिवजी सृष्टि, पालन और संहार का कर्ता हैं। उनका स्वरूप सगुण और निर्गुण है! शिवजी स्वयं कहते हैं कि मैं ही सच्चिदानंद निर्विकार परमब्रह्म और परमात्मा हूं। शिवजी की आराधना में निर्गुण भक्ति धारा और भक्त निराकार लिंग स्वरूप की उपासना पर जोर देते हैं। इस युग में भी इस भक्ति धारा के प्रमुख कवियों में कबीर, नानक, दादू दयाल, रैदास, मलूकदास आदि प्रमुख कवि थे। सगुण भक्ति धारा के भक्त ईश्वर के सगुण स्वरूप के भक्ति पर जोर देते थे, जिसमें तुलसीदास, सूरदास, कुंदन दास, कृष्णदास, मीरा, रसखान, रहीम आदि के नाम प्रमुख थे। सगुण भक्ति की दो शाखायें थीं जो रामाश्रयी और कृष्णाश्रयी शाखाओं में विभाजित थीं। सगुण और निर्गुण भक्ति में कोई अन्तर नहीं है. जब हम भक्ति मार्ग को अपनाते हैं तो शुरू शुरू में भगवान के निर्गुण, निराकार रूप को समझना आसान नहीं होता। सगुण, तनधारी रूप पर आकर्षण और ध्यान आसान होता है। भक्ति मार्ग के लिये इससे अधिक कुछ नहीं चाहिये। जिस भी रूप को देखकर आपका मन प्रसन्न होता है उसी रूप का दर्शन और...

सचेतन :71 श्री शिव पुराण- ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अपने विराट आयुर्बल के कारण सृष्टि की रचना, रक्षा और प्रलयरूप गुणों को धारण किए हुए हैं।

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सचेतन :71 श्री शिव पुराण- ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अपने विराट आयुर्बल के कारण  सृष्टि की रचना, रक्षा और प्रलयरूप गुणों को धारण किए हुए हैं। #RudraSamhita शिवजी सृष्टि, पालन और संहार का कर्ता हैं। उनका स्वरूप सगुण और निर्गुण है! वे  ही सच्चिदानंद निर्विकार परमब्रह्म और परमात्मा हैं। सृष्टि की रचना, रक्षा और प्रलयरूप गुणों के कारण शिवजी ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण कर तीन रूपों में विभक्त  हुए हैं। शिवजी भक्तवत्सल  और भक्तों की प्रार्थना को सदैव पूरी करता हैं। मेरे इसी अंश से रुद्र की उत्पत्ति होगी। सगुण और निर्गुण भक्ति में कोई अन्तर नहीं है. जब हम भक्ति मार्ग को अपनाते हैं तो शुरू शुरू में भगवान के निर्गुण, निराकार रूप को समझना आसान नहीं होता. सगुण, तनधारी रूप पर आकर्षण और ध्यान आसान होता है. भक्ति मार्ग के लिये इससे अधिक कुछ नहीं चाहिये. जिस भी रूप को देखकर आपका मन प्रसन्न होता है उसी रूप का दर्शन और ध्यान करते रहने से धीरे-धीरे वह स्वरुप आपके मन में अंकित हो जाता है तथा उसके बाद आप किसी भी स्थान और समय पर ध्यान कर सकते हैं. जब हम भक्ति वश हो जाते हैं तो हम ...

सचेतन :70 श्री शिव पुराण- ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के आयुर्बल

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सचेतन :70 श्री शिव पुराण- ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के आयुर्बल  #RudraSamhita परमेश्वर शिव जी भगवान विष्णु जी से बोले, हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले विष्णु! तुम सर्वदा सब लोकों में पूजनीय और मान्य होंगे। भगवान विष्णु जी को ब्रह्माजी के द्वारा रचे लोक में कोई दुख या संकट होने पर दुखों और संकटों का नाश करने के लिए तुम सदा तत्पर रहने का वर दिया और उनको अनेकों अवतार ग्रहण कर जीवों का कल्याण कर अपनी कीर्ति का विस्तार करने की शक्ति मिला।परमेश्वर शिव जी ने कहा की मैं भगवान विष्णु जी के कार्यों में सहायता करूंगा और शत्रुओं का नाश करूंगा।  मनुष्य को रुद्र का भक्त होकर भगवान विष्णु जी की निंदा नहीं करने का अनुरोध किया।  ब्रह्माजी ने महर्षि नारद जी से कहा की ऐसा कहकर भगवान शिव ने मेरा हाथ विष्णुजी के हाथ में देकर कहा- तुम संकट के समय सदा इनकी सहायता करना तथा सभी को भोग और मोक्ष प्रदान करना तथा सभी मनुष्यों की कामनाओं को पूरा करना। तुम्हारी शरण में आने वाले मनुष्य को मेरा आश्रय भी मिलेगा तथा हममें भेद करने वाला मनुष्य नरक में जाएगा। ब्रह्माजी कहते हैं ;- देवर्षि नारद! भगवान शिव का य...

सचेतन :69 श्री शिव पुराण- श्रीहरि को सृष्टि की रक्षा का भार मिला है

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सचेतन :69 श्री शिव पुराण- श्रीहरि को सृष्टि की रक्षा का भार मिला है  #RudraSamhita 'ॐ तत्वमसि' महावाक्य के दृष्टिगोचर से हम ब्रह्म को हर जीव, जगत और ईश्वर के बहुत पाते हैं और इस महावाक्य का अर्थ है-'वह ब्रह्म तुम्हीं हो।'  उसी ब्रह्म को 'तत्त्वमसि' कहा गया है। वह शरीर और इन्द्रियों में रहते हुए भी, उनसे परे है। आत्मा में उसका अंश मात्र है। उसी से उसका अनुभव होता है।  धर्म और अर्थ के साधक बुद्धिस्वरूप चौबीस अक्षरीय गायत्री मंत्र, जो पुरुषार्थ रूपी फल देने वाला है। तत्पश्चात मृत्युंजय मंत्र फिर पंचाक्षर मंत्र आदि से दक्षिणामूर्ति व चिंतामणि का साक्षात्कार संभव है। इन मंत्रों को विष्णु भगवान ने ग्रहण कर जपना आरंभ किया। ईशों के मुकुट मणि ईशान हैं, जो पुरातत्व पुरुष हैं, हृदय को प्रिय लगने वाले, जिनके चरण सुंदर हैं, जो सांप को आभूषण के रूप में धारण करते हैं, जिनके पैर व नेत्र सभी ओर हैं, जो मुझ ब्रह्मा के अधिपति, कल्याणकारी तथा सृष्टिपालन एवं संहार करने वाले हैं। उन वरदायक शिव की मेरे साथ भगवान विष्णु ने प्रिय वचनों द्वारा संतुष्ट चित्त से स्तुति करनी चाहिए। ब्रह्माज...

सचेतन :68 ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान से संभव है

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सचेतन :68 श्री शिव पुराण- ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान  से संभव है  #RudraSamhita जब आपके आंतरिक शरीर में ऋषि जैसे विशिष्ट व्यक्ति के समान अपकी विलक्षण एकाग्रता हो जाएगा तो उसके बल पर गहन ध्यान में आप विलक्षण शब्दों के दर्शन करके उनके गूढ़ अर्थों को जान सकेंगे।  शब्द की सिद्धि के बारे में यजुर्वेद में बताया गया है। जिसके ज्ञान से आप दिव्यमय हो सकते हैं और विश्वपालक भगवान का और स्वयं का एक अद्भुत व सुंदर रूप देख सकते हैं ।  'अकार' उनका मस्तक और आकार ललाट है। इकार दाहिना और ईकार बायां नेत्र है। उकार दाहिना और ऊकार बायां कान है। ऋकार दायां और ऋकार बायां गाल है। ऌ, र्लिं उनकी नाक के छिद्र हैं। एकार और ऐकार उनके दोनों होंठ हैं। ओकार और औकार उनकी दोनों दंत पक्तियां हैं। अं और अः देवाधिदेव शिव के तालु हैं। 'क' आदि पांच अक्षर उनके दाहिने पांच हाथ हैं और 'च' आदि बाएं पांच हाथ हैं। 'त' और 'ट' से शुरू पांच अक्षर उनके पैर हैं। पकार पेट है, फकार दाहिना और बकार बायां पार्श्व भाग (अर्धनारीश्वर का एक पार्श्व स्त्री का तथा दूसरा पुरुष का) है। ...

सचेतन :67 श्री शिव पुराण- ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान से संभव है

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सचेतन :67 श्री शिव पुराण- ॐ तत्वमसि' महावाक्य का दृष्टिगोचर शब्द ज्ञान  से संभव है  #RudraSamhita जब आपके आंतरिक शरीर में ऋषि जैसे विशिष्ट व्यक्ति के समान अपकी विलक्षण एकाग्रता हो जाएगा तो उसके बल पर गहन ध्यान में आप विलक्षण शब्दों के दर्शन करके उनके गूढ़ अर्थों को जान सकेंगे। आप स्वयं और मानव अथवा प्राणी के कल्याण के लिये ध्यान में देखे गए शब्दों को लिखकर प्रकट कर पायेंगे। जिसे हम सभी विनियोग यानी किसी फल के उद्देश्य से या किसी विषय के प्रयोग हेतु किसी वैदिक कृत्य के लिए इस मंत्र का प्रयोग कर सकते हैं। इसकी सिद्धि यजुर्वेद में भी होती है। जिसके ज्ञान से आप दिव्यमय हो सकते हैं और विश्वपालक भगवान का और स्वयं का एक अद्भुत व सुंदर रूप देख सकते हैं ।  'अकार' उनका मस्तक और आकार ललाट है। इकार दाहिना और ईकार बायां नेत्र है। उकार दाहिना और ऊकार बायां कान है। ऋकार दायां और ऋकार बायां गाल है। ऌ, र्लिं उनकी नाक के छिद्र हैं। एकार और ऐकार उनके दोनों होंठ हैं। ओकार और औकार उनकी दोनों दंत पक्तियां हैं। अं और अः देवाधिदेव शिव के तालु हैं। 'क' आदि पांच अक्षर उनके दाहिने पांच हाथ है...

सचेतन :66 श्री शिव पुराण- स्वर और व्यंजन की ध्वनि मात्र से महादेव व भगवती उमा के दर्शन।

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सचेतन :66 श्री शिव पुराण- स्वर और व्यंजन की ध्वनि मात्र से महादेव व भगवती उमा के दर्शन।  #RudraSamhita माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सदा ॐ की ध्वनी निसृत होती रहती है. हमारी और आपके हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है. यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित करता है. 'ॐ' नाद का साक्षात दर्शन एवं अनुभव चिंता रहित रुद्र के समान है। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याण कारक है। ब्रह्माजी ने महर्षि नारद जी को बताया की इसका ज्ञान एक ऋषि प्रकट होने से हुआ। ऋषि अर्थात "दृष्टा" भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है सुना हुआ, यानि ईश्वर की वाणी जो प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा सुनी गई थी और शिष्यों के द्वारा सुनकर जगत में फैलाई गई थी।  जब आपके आंतरिक शरीर में ऋषि जैसे विशिष्ट व्यक्ति के समान अपकी विलक्षण एकाग्रता हो जाएगा तो उसके बल पर गहन ध्यान में आप विलक्षण शब्दों के दर्शन करके उनके गूढ़ अर्थों ...

सचेतन :65 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: रूद्र और ऋषि कल्याण कारक है।

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सचेतन :65 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: रूद्र और ऋषि कल्याण कारक है। #RudraSamhita माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से सदा ॐ की ध्वनी निसृत होती रहती है. हमारे  और आपके हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है. यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित करता है. सर्वत्र व्याप्त होने के कारण इस ध्वनि (ॐ) को ईश्वर (प्रणव) की संज्ञा दी गई है. ब्रह्माजी जब महर्षि नारद जी को अग्नि-स्तम्भ से निकल रहे 'ॐ' नाद का साक्षात दर्शन एवं अनुभव के बारे में बता रहे थे तो वे बोले जब मैं और विष्णुजी विश्वात्मा शिव का चिंतन कर रहे थे, तभी वहां एक ऋषि प्रकट हुए। उन्हीं ऋषि के द्वारा परमेश्वर विष्णु ने जाना कि इस शब्द ब्रह्ममय शरीर वाले परम लिंग के रूप में साक्षात परब्रह्म स्वरूप महादेव जी प्रकट हुए हैं। ये चिंता रहित रुद्र हैं। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याण कारक है। ऋषि अर्थात "दृष्टा" भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। श्रुति का शाब्दिक अ...

सचेतन :64 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: शब्द ब्रह्ममय से ब्रह्मांड की उत्पत्ति

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सचेतन :64 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: शब्द ब्रह्ममय से ब्रह्मांड की उत्पत्ति  #RudraSamhita ब्रह्माजी बोले ;– मुनिश्रेष्ठ नारद! को 'ॐ' नाद स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने के बाद कहा की आप ध्वनि को सिर्फ सुन ही नहीं सकते, देख भी सकते हैं। उसे महसूस करने का एक तरीका होता है।  ब्रह्माजी बोले ;– मुनिश्रेष्ठ नारद! हमारी उपासना के बाद से प्रसन्न हो गए। उस समय वहां अग्नि-स्तम्भ से 'ॐ' नाद स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहा था। लिंग के दक्षिण भाग में सनातन आदिवर्ण अकार का दर्शन किया जो अ आदि वर्ण हैं। ये सभी वर्ण-ध्वनियों में व्याप्त हैं। उत्तर भाग में उकार का अनुभव किया जो प्राण वायु के साथ अनुभव हुआ। मध्य भाग में मकार का अनुभव किया। इसे पंचमकार शब्द भी कहते है जिसका अर्थ 'म से आरम्भ होने वाली पाँच वस्तुएँ' है, ये पाँच वस्तुएँ जिसके साधना से मद्य यानी  अमृत का पैदा होना, दूसरा मांस- शरीर पर नियंत्रण, मत्स्य यानी प्राणायाम द्वारा गति पर नियंत्रण, मुद्रा यानी दैनिक जीवन में हमारा व्यवहार विचार अर्थात् सत्संग और पाँचवा मैथुन यानी ऊर्जावान होकर कुण्डलिनी को सहस्रचक्र तक ले जाना और अंत...

सचेतन :63 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: ब्रह्मा-विष्णु को भगवान शिव के शब्दमय शरीर का दर्शन

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सचेतन :63 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: ब्रह्मा-विष्णु को भगवान शिव के शब्दमय शरीर का दर्शन #RudraSamhita ब्रह्मा- विष्णु के बीच में अग्नि-स्तम्भ प्रकट हुआ उन्होंने तय किया कि जो भी इस स्तंभ का अंतिम छोर खोज लेगा, वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्मा जी स्तंभ के ऊपरी भाग में गए और विष्णु जी नीचे वाले हिस्से में गए।लेकिन जब विष्णु जी को स्तंभ का अंतिम छोर नहीं मिला तो वे लौट आए, वहीं दूसरी तरफ ब्रह्मा जी ने खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए केतकी के फूल के साथ मिलकर एक योजना बनाई स्तंभ से बाहर निकलकर केतकी के फूल ने झूठ बोल दिया कि ब्रह्मा जी ने इस स्तंभ का अंतिम छोर ढूंढ लिया है।जैसे ही केतकी के फूल ने ये झूठ बोला, शिव जी ने ब्रह्मा जी के झूठ को पकड़ लिया और क्रोधित होकर उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दे दिया कि आपने झूठ बोला है, इसलिए अब से आपकी पूजा नहीं होगी। फिर विष्णु जी ने शिव जी से शाप वापस लेने का निवेदन किया तो शिव जी ने उनकी बात मानते हुए कहा कि अब से यज्ञ में ब्रह्मा जी को गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकेगा। ब्रह्मा जी के बाद शिव जी ने केतकी के फूल से कहा कि तूने झूठ में साथ दिया और झूठ ...